शान्ति
शान्ति
ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
साथ रक्षा हो, साथ पोषण हो, साथ बल लगे, और हम एक दूसरे से द्वेष न करें।
यही क्यों
इसकी हर क्रिया द्विवचन में है। न मैं, न सब: हम दोनों। सिखाने वाला और सीखने वाला, दोनों एक साथ बोलते हैं, सिखाने से पहले।
इसीलिये यह यहाँ है। इस प्रशिक्षण का छठा चरण वही है: जो इससे होकर निकला है, वह उसके सामने खड़ा है जो अभी इसी में है। कोई किसी से ऊपर नहीं। यह वाक्य उसी कमरे का है, और उसी कमरे के लिये तीन हज़ार साल पहले लिखा गया था।
मा विद्विषावहै पर ठहरिये। हम एक दूसरे से द्वेष न करें। यह भावुकता नहीं है। यह मानकर चलता है कि कठिन काम में साथ लगे दो लोग अक्सर एक दूसरे से चिढ़ने लगते हैं, और शुरू करने से पहले प्रार्थना करता है कि इस बार ऐसा न हो।
वाचिक: एक साँस छोड़ने भर की लंबाई में, बोलकर। अक्षर साथ-साथ जलते हैं। उपांशु: होंठ हिलते हैं, साँस उसे उठाती है, कमरे में कोई और नहीं सुनता। मंत्र पर्दे पर रहता है, पर हिलता नहीं। मानस: कुछ कहा नहीं जाता, कुछ दिखाया नहीं जाता। केवल साँस और गिनती। अन्तर्यात्रा: एक माला जो अपने आप भीतर की ओर जाती है। पहला तिहाई बोलकर, दूसरा फुसफुसाकर, आख़िरी मन में। आवाज़ कमरे से अपने आप चली जाती है, आपको तय नहीं करना पड़ता।
कितनी बार
तीन ही पूरा है। एक बार आरंभ में, एक बार अंत में।
किस तरह
यही परंपरा का क्रम है, और यह स्तरों की सीढ़ी नहीं, भीतर की ओर लौटना है। यहाँ कुछ भी बंद नहीं है। आज आप जिस पायदान पर हैं, वहीं खड़े रहिये।