तस्वीरें, और उनके भीतर क्या है

ज्योतिर्गण होने की क़ीमत

पश्चिमी राजस्थान के एक महीने की तेरह तस्वीरें।
हर एक में कुछ ऐसा है जो देखकर कभी पता नहीं चलेगा

सब यही मानते हैं कि असल चीज़ योग है।

नहीं है। योग उस शरीर को दोबारा खड़ा करता है जो बरसों से उधार पर चल रहा था, और यह मामूली बात नहीं है, और हमने इसे नापा भी है। लेकिन कोई ज्योतिर्गण कैसे बनता है, यह हमारे वहाँ पहुँचने से बहुत पहले तय हो चुका होता है। और वह ऐसी चीज़ नहीं जिसे कोई अपनी मर्ज़ी से चुने।

उसके लिए सब कुछ गँवाना पड़ता है।

जिस आदमी के पास अब भी उसकी इज़्ज़त बची है, जमा-पूँजी बची है, घरवालों की अच्छी राय बची है, उसके पास बचाने को कुछ है। और जिसके पास बचाने को कुछ हो, वह समर्पण नहीं कर पाता। जो यह सब पहले ही खो चुका है, उसके पास बचाने लायक़ कोई दीवार रह ही नहीं गई।

यह उनकी बदक़िस्मती नहीं है। इस काम में यही उनकी पात्रता बन जाती है।

जो कुछ हम हैं, वह सब सौंप देना, ताकि वह बन सकें जो हम सचमुच हैं।

नीचे जो कुछ है, वह यही एक वाक्य है, किसी न किसी के साथ घटता हुआ।

रात में शामियाने के नीचे ज़मीन पर बैठे लोग, हाथ जुड़े हुए, आँखें बंद, किनारे पर ढोलक।
०१

जब कहने को कोई बचा ही नहीं था

वे उसी एक से बात कर रहे हैं जिसने कभी मुँह नहीं मोड़ा।

पूरी बात

ज्योतिर्गण बनने का फ़ैसला कोई नहीं करता। इसके लिए अर्ज़ी नहीं दी जाती। ताक़तवर होकर, समझदार होकर या अच्छा आदमी होकर इसमें जगह नहीं मिलती। अगर ऐसा होता, तो इस तस्वीर में बैठा एक भी आदमी यहाँ न होता।

यहाँ आदमी उसी तरह पहुँचता है जैसे कुएँ की तली तक पहुँचता है।

पहले दोस्त आना बंद कर देते हैं। फिर भाई बहस करना छोड़ देता है, और यह उससे भी बुरा है, क्योंकि जब तक वह बहस कर रहा था तब तक वह मानता था कि आप तक पहुँचा जा सकता है। फिर पत्नी आपके सामने रोना बंद कर देती है और कहीं और जाकर रोने लगती है। फिर बेटा सीख जाता है कि उस कमरे के आगे से चुपचाप निकल जाना है।

कोई दरवाज़ा ज़ोर से बंद नहीं करता। लोग बस थक जाते हैं। एक-एक करके, धीरे से, हर वह इंसान जिसके पास आप जा सकते थे, वह इंसान बन जाता है जिसके पास अब नहीं जाया जा सकता। और आप अपने ही भरे-पूरे घर में खड़े रह जाते हैं, जहाँ किसी से कहने को कुछ नहीं बचा।

यह तस्वीर शाम ढले की है। हाथ देखिए। आँखें देखिए, जो बंद हैं। सामने कोई नहीं है। न कोई सलाहकार, न डॉक्टर, न कोई रिश्तेदार यह देखने आया कि आज ली या नहीं, न कोई काग़ज़-क़लम लिए हुए।

वे उसी एक से बात कर रहे हैं जिसने कभी मुँह नहीं मोड़ा। जिसने कभी नहीं पूछा कि पैसा कहाँ गया। जिसे इनके साथ देखे जाने पर कभी शर्म नहीं आई।

उनका सब कुछ पहले ही जा चुका था। तो दिन के आख़िर में उन्होंने वह भी दे दिया, क्योंकि देने को बस वही बचा था।

ज्योतिर्गण न हमारा है, न कार्यक्रम का, और आख़िर में अपना भी नहीं। वह उसी का है जिसने उनकी पूरी गैरहाज़िरी में उनका दीया जलाए रखा।

रात में लाल दरी पर बिछे रंगीन मैटों पर बैठा पूरा शिविर, एक ही लैंप की रोशनी में।
०२

एक ही दरी पर

इस तस्वीर में स्टाफ़ को ढूँढ़िए। मिलेगा नहीं।

पूरी बात

आगे कोई क़तार नहीं है। किनारे पर कार्यक्रम चलाने वालों के लिए कुर्सियाँ नहीं हैं। डिग्रीवालों के लिए अलग इंतज़ाम नहीं है। प्रशिक्षक और शोधकर्ता उसी फ़र्श पर, उन्हीं मैटों पर, उसी अँधेरे में, उसी वक़्त, वही कर रहे हैं।

यह बात दिखने से कहीं ज़्यादा बड़ी है।

यहाँ बैठे हर आदमी ने बरसों ऊपर से बरता जाना झेला है। डॉक्टर ऊपर। पुलिस ऊपर। बड़े-बुज़ुर्ग ऊपर। और आख़िर में अपने ही बच्चे ऊपर। सब ऊपर से बोलते हुए। वे एक केस रहे, एक समस्या, एक बोझ, एक शर्म। दया भी ऊँचाई से ही आती रही।

यहाँ कोई किसी से ऊपर नहीं है, क्योंकि छत आसमान है और जिससे बात हो रही है वह सबके लिए एक ही है।

भगवान के सामने न कोई नशेड़ी है न कोई शोधकर्ता, न कोई अनपढ़ न कोई डॉक्टरेट, न कोई गाँव का न कोई शहर का। सिर्फ़ बच्चे हैं, और उनमें कोई चहेता नहीं है।

कोई पूछे कि असली इलाज कहाँ होता है, तो हम सुबह की कक्षा की तरफ़ इशारा नहीं करेंगे। हम यहाँ की तरफ़ करेंगे।

सूरज निकलते समय रेत के आँगन में शुद्धि क्रिया करते लोग, टीम का एक सदस्य पानी देते और सिर थामे हुए, ज़मीन पर लंबी परछाइयाँ।
०३

जिन्होंने विष पिया

वे उस गाँव की नाकामी नहीं हैं। वे वही हैं जिनके हाथ में गाँव ने ज़हर थमा दिया।

पूरी बात

आप सूरज निकलते समय, खुले में, सबके सामने होती एक योगिक शुद्धि क्रिया देख रहे हैं। इसके बारे में कोई राय बनाने से पहले सुनिए कि हम इसमें क्या देखते हैं।

समुद्र मंथन हुआ तो सबसे पहले अमृत नहीं निकला। हलाहल निकला। इतना भयंकर कि न देवता उसके पास गए, न दानव। सारा किया-धरा बेकार जाने को था, क्योंकि अमृत तक पहुँचने से पहले किसी को वह विष लेना था, और कोई तैयार नहीं था।

फिर शिव आए और उसे पी गए। इसलिए नहीं कि गलती उनकी थी। इसलिए नहीं कि वे उसके हक़दार थे। उन्होंने इसलिए लिया कि वह वहाँ था, कि किसी को तो लेना ही था, और कि वही थे जो उसे कंठ में रोककर जीवित रह सकते थे।

उसके बाद ही अमृत निकला।

शिव के साथ चलने वालों को उनका गण कहते हैं। हर कथा में देखिए वे कौन हैं। अजीब लोग। जो किसी खाँचे में नहीं बैठते। जिन्हें कोई सम्मानित घर अपने विवाह में जगह नहीं देगा।

हम इन्हें ज्योतिर्गण कहते हैं, और ठीक इसी अर्थ में कहते हैं।

एक गाँव की अफ़ीम की भूख उसके रीति-रिवाज़ों में, उसके मौसर में, उसकी मेहमाननवाज़ी में और उसकी फ़सल में घुली रहती है। बड़े-बुज़ुर्ग पेश करते हैं। बैठकों में हाथ से हाथ चलती है। और उसी गाँव में कोई एक आदमी उस पूरे बोझ को अपने शरीर में ढोने लगता है। बदनाम उसी का नाम होता है। तरस उसी के घर पर खाया जाता है। बाकी सब चलता रहता है।

वे उस गाँव की नाकामी नहीं हैं। वे वही हैं जिनके हाथ में गाँव ने ज़हर थमा दिया।

अब दोबारा देखिए कि सुबह छह बजे, आँखों से पानी बहते हुए, वे कर क्या रहे हैं।

वे उसे बाहर निकाल रहे हैं। पूरा का पूरा। ताकि अमृत आ सके, और अकेले अपने लिए नहीं। उस पत्नी के लिए जिसने सामने रोना छोड़ दिया था। उस बेटे के लिए जो कमरे के आगे से चुपचाप निकलना सीख गया था। उस पंद्रह साल के लड़के के लिए जिसे गली में अभी-अभी पहली बार पेश की गई है।

विष लेने के लिए किसी ने उनका शुक्रिया नहीं कहा। अमृत वे फिर भी लौटाकर जाएँगे।

शोध-दल की दो युवतियाँ प्रतिभागियों को कंप्यूटर पर जाँच करा रही हैं, एक उम्रदराज़ व्यक्ति स्क्रीन पर ध्यान लगाए, पीछे बाकी अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए।
०४

जैसे कोई अपने ही दादा को समझाता है

इस परियोजना का एक रूप ऐसा भी हो सकता था जिसमें यह तस्वीर होती ही नहीं।

पूरी बात

यह संज्ञानात्मक क्षमता की जाँच है।

उस दूसरे रूप में कोई समझदार आदमी कहता: ये किसान हैं, ज़्यादातर ने स्कूल पूरा नहीं किया, कई तो स्क्रीन पर लिखा पढ़ ही नहीं पाएँगे, पूरा दिन लग जाएगा, और आख़िर फ़ायदा क्या। मुश्किल आबादी के लिए मुश्किल जाँचें चुपचाप हटा दी जातीं। यह फ़ैसला कहीं लिखा न जाता। सब मान लेते कि व्यावहारिक ही तो किया।

हमने वह नहीं किया। इस शिविर के हर आदमी को हर जाँच का मौक़ा दिया गया। पढ़े-लिखे होने की कोई शर्त नहीं रखी गई। किसी को यह कहकर अलग नहीं किया गया कि बहुत बूढ़े हैं, गाँव के हैं, या अब कुछ बचा ही नहीं।

और यह आसान नहीं था। स्क्रीन के सामने बैठे सज्जन को देखिए, साठ पार, पूरे चेहरे से ध्यान लगाए हुए। पीछे बाकी लोग खड़े-खड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं, क्योंकि किसी और की बारी चलते हुए वे बैठने को तैयार नहीं थे।

अब उन युवतियों को देखिए।

वे झुकी हुई हैं, स्क्रीन पर उँगली रखकर दिखा रही हैं, दोबारा कह रही हैं। और फिर, किसी और तरीक़े से। ठीक वैसे जैसे आप अपने पिता को कुछ समझाते हैं जब उनकी समझ में नहीं आ रहा और आप उन्हें प्यार करते हैं, इसलिए आप झुँझलाते नहीं, घड़ी नहीं देखते, और तब तक नए शब्द ढूँढ़ते रहते हैं जब तक कोई एक बात बैठ न जाए।

एक भी सवाल को बेवक़ूफ़ी का सवाल नहीं माना गया। हर सवाल को वही समझा गया जो वह सचमुच है।

जिस आदमी को सबने लिख-पढ़कर छोड़ दिया, उसके हाथ में ऐसी जाँच थमाई जाती है जो मानकर चलती है कि वह कर लेगा, और कोई तब तक साथ बैठा रहता है जब तक वह कर न ले। यह आँकड़े जुटाना नहीं है। यह बरसों में पहली बार है कि किसी ने उनसे कुछ उम्मीद की और फिर इंतज़ार भी किया।

चमकीले शामियाने के नीचे पूरी कक्षा एक कठिन आसन में, हाथ ऊपर उठाए, प्रशिक्षक नीची लकड़ी की चौकी पर।
०५

तलब का पूर्वाभ्यास

वे आसन नहीं सीख रहे। वे उस आदमी से मिल रहे हैं जो भीतर हमेशा से मौजूद था।

पूरी बात

यह हिस्सा कोई ठीक से नहीं समझाता, तो हम समझा देते हैं।

आसन आसान से शुरू हुए। हफ़्तों में कठिन होते गए, और फिर सचमुच कड़े, जब तक ये लोग ऐसी मुद्राओं में टिकने न लगे जिनमें उनका शरीर टिकना नहीं चाहता था, और उससे ज़्यादा देर टिकने न लगे जितनी देर शरीर चाहता था।

यही मक़सद था, और इसका तंदुरुस्ती से कोई लेना-देना नहीं था।

तलब असल में होती क्या है, सुनिए। एक संवेदना शरीर में उठती है। वह कोई विचार नहीं है और आप उससे बहस नहीं कर सकते। वह कहती है अभी, और यह वह छाती में, पेट में और खाल में कहती है, और कहती ही चली जाती है। इस तस्वीर का हर आदमी उस आवाज़ को अपनी आवाज़ से बेहतर पहचानता है। और हर एक ने बरसों में यही सीखा था कि जब शरीर उस आवाज़ में बोले, तो जीत शरीर की होती है।

अब देखिए वे क्या कर रहे हैं।

वे एक आसन में टिके हैं। जाँघें जल रही हैं। कंधे नीचे आने की माँग कर रहे हैं। संवेदना तेज़ है, शारीरिक है, तुरंत की है, और वह अभी कह रही है, और वे उसका कहा नहीं मान रहे। वे साँस ले रहे हैं। टिके हुए हैं। उसे जितना ऊँचा बोलना है बोलने दे रहे हैं।

और फिर वह गुज़र जाती है।

उन्होंने अभी-अभी, अपनी ही माँसपेशियों में, ठीक उस चीज़ का पूर्वाभ्यास किया है जो उन्हें दो महीने बाद अपने गाँव में अकेले करनी होगी।

और टिके रहते हुए उन्हें सिखाया जाता है कि ध्यान को धीरे-धीरे पूरे शरीर में घुमाएँ। यहाँ दर्द है। यहाँ शांति है। यहाँ दर्द अभी-अभी जा रहा है। जिस आदमी ने बीस साल अपने ही शरीर से बाहर रहकर बिताए हों, उसके लिए यह असाधारण काम है। वे उसमें वापस जा रहे हैं, कमरा-दर-कमरा, यह देखते हुए कि उनकी गैरहाज़िरी में उसका क्या हाल हुआ, और उसी साँस में यह भी कि वह अब भी क्या-क्या कर सकता है।

वे आसन नहीं सीख रहे। वे कुछ पलों के लिए उस आदमी से मिल रहे हैं जो इस पूरे अरसे भीतर ही था, उस सारे बोझ के नीचे जो नशे ने ऊपर लाद दिया था।

वह आदमी कभी ख़त्म नहीं हुआ था। बस दब गया था। और हर सुबह, पिछली सुबह से थोड़ी ज़्यादा देर के लिए, वह बाहर आ जाता है।

शामियाने के नीचे प्रशिक्षक नीची लकड़ी की चौकी पर छाती खोलने वाला गहरा आसन दिखाते हुए, पूरी कक्षा वही करते हुए।
०६

जाम्बवंत का काम

हनुमान किनारे पर बैठे रहे। आगे नहीं आए। वे भूल चुके थे कि वे क्या हैं।

पूरी बात

रामायण में एक क्षण है जिसे कोई पोस्टर पर नहीं छापता।

सेना समुद्र तक पहुँच चुकी है। किसी को उसे पार करना है, और कोई कर नहीं पा रहा, और सारा अभियान वहीं किनारे पर ख़त्म होने को है। हनुमान उन्हीं के बीच बैठे हैं। वे आगे नहीं आते। उन्हें लगता ही नहीं कि यह काम उनका है। वे भूल चुके हैं कि वे क्या हैं।

तब जाम्बवंत खड़े होते हैं और बस वही करते हैं जिसकी ज़रूरत थी। वे हनुमान को शक्ति नहीं देते। वे उन्हें बताते हैं कि शक्ति उनके पास पहले से है। वे याद दिलाते हैं कि वे किसके पुत्र हैं, बचपन में उन्होंने क्या किया था, और अब भी उनके भीतर क्या है।

और हनुमान उठकर समुद्र लाँघ जाते हैं।

यह पूरी तस्वीर बस इतनी ही है।

ये हनुमान जी को समर्पित आसन हैं, और इन्हें करते समय स्पीकर पर बजरंग बाण बजता रहता है। आकृतियाँ देखिए। इनमें से लगभग सब छाती खोलते हैं। हृदय आगे और ऊपर जाता है, बाँहें पीछे जाती हैं, कंठ खुल जाता है। फिर वह झुकाव, शरीर समेटकर ऐसे तिरछा जैसे कोई छलाँग लगाने को तैयार हो। फिर जुड़े हुए हाथ।

साहस। छलाँग। भक्ति। इसी क्रम में, हर सुबह।

जिस आदमी को पंद्रह साल से नशेड़ी कहा जा रहा हो, उसे यह बताने की ज़रूरत नहीं कि वह कमज़ोर है। वह सुन चुका है। वह मान चुका है। वह इससे सहमत भी है, और सबसे बुरी बात यही है।

उन्हें चाहिए कोई जो जाम्बवंत की तरह खड़ा होकर याद दिला दे कि भीतर अब भी क्या है। कुछ देना नहीं है। बस वह बता देना है जो पहले से उनका है।

जो समुद्र इन्हें पार करना है वह पानी का नहीं है, और जो लंका इन्हें जलानी है वह कोई नगरी नहीं है। पर इस तस्वीर में खुली हुई छाती देखिए, और जुड़े हुए हाथ, और फिर कहिए कि यह कोई अपने आप को याद करता हुआ आदमी नहीं है।

रेत में घुटनों के बल बैठा प्रशिक्षक, शवासन में लेटे काली टोपी वाले व्यक्ति की छाती पर दोनों हाथ रखे हुए, पास में और लोग विश्राम में।
०७

वह टोपी

उन्होंने टोपी ऐसे माँगी जैसे बच्चा अपने पिता से माँगता है। सामने वाले ने अपनी उतार दी।

पूरी बात

इस कार्यक्रम की सबसे ज़रूरी बात यही है, और यह प्रोटोकॉल में लिखी नहीं है, और किसी प्रशिक्षण में सिखाई नहीं जा सकती।

इन लोगों तक तकनीक से नहीं पहुँचा जा सकता। आप बिल्कुल सही हो सकते हैं, हर चरण का पालन कर सकते हैं, बहुत सुंदर क्रम बना सकते हैं, और कुछ भी हासिल नहीं होगा। ये मुश्किल लोग नहीं हैं। ये मुश्किल के बिल्कुल उल्टे हैं। ये बच्चों जैसे हैं, पूरी तरह खुले और बिल्कुल बेबचाव, और बच्चा पल भर में जान लेता है कि आप उससे प्रेम कर रहे हैं या उसे सँभाल रहे हैं।

तो आप पढ़ाते नहीं। निर्देश नहीं देते। समझाते नहीं।

आप उनसे प्रेम करते हैं। हर वक़्त। जब वे साथ दें तब भी और जब वे बग़ावत करें तब भी, जब वे कृतज्ञ हों तब भी और जब वे नाइंसाफ़ हों तब भी, जब आसान हो तब भी और जब उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया हो जिसके बाद कोई और उठकर चला जाता। आप बस प्रेम करते हैं, और करते रहते हैं, और वही काम कर जाता है जो और कुछ नहीं कर पाता।

एक मामूली दोपहर में यह ऐसा दिखता है।

उनमें से एक ने सिर मुँडवा लिया था। बाकी लोग उन्हें छेड़ रहे थे, प्यार वाली छेड़, पर उन्हें लग गई। वे हमारे एक वरिष्ठ साथी के पास ऐसे आए जैसे बच्चा अपने पिता के पास जाता है, और कहा:

मुझे एक टोपी चाहिए।

उन्होंने अपने सिर से टोपी उतारी और उनके सिर पर रख दी।

बस इतना ही हुआ। किसी ने भाषण नहीं दिया। और उसके बाद वे वह टोपी रोज़ पहनते रहे, इसलिए नहीं कि सिर ठंडा लगता था। वे उसे तमग़े की तरह पहनते थे। जिन दिनों खिंचाव लौट आता, और वह लौटता है, वह टोपी बिना कहे यह कह देती थी कि आप हममें से एक हैं

इस तस्वीर में वे वही टोपी पहने हुए हैं। वे लेटे हुए हैं, किसी के हाथ उनकी छाती पर हैं, और उन्हें साँस लेना सिखाया जा रहा है।

ज़रा सोचिए। इन लोगों को कभी किसी ने साँस लेना नहीं सिखाया। किसी ने कभी देखा तक नहीं। दुनिया इन पर नाराज़ होने में इतनी व्यस्त थी कि किसी को यह ख़याल ही नहीं आया कि इन्हें हवा पूरी मिल भी रही है या नहीं।

तो हमने छाती पर हाथ रखा। तकनीक की तरह नहीं। हाथ जो होता है, वैसे। और जिस हाथ का मतलब आपसे प्रेम है हो, उसके नीचे साँस अपने आप गहरी हो जाती है, क्योंकि शरीर आख़िरकार मान लेता है कि यहाँ ढीला छोड़ देना सुरक्षित है।

वे इसे मिनटों में सीख लेते हैं। इसलिए नहीं कि हम अच्छे शिक्षक हैं। इसलिए कि वह प्रेम से दिया गया, और प्रेम ही इकलौती भाषा है जो उन्हें कभी अच्छी तरह आती थी।

हवन चलता हुआ: रेत पर रखे ताम्र कुंड में अग्नि, चारों ओर फूलों की पंखुड़ियाँ, बैठे प्रतिभागी आहुति देते हुए।
०८

क्या हम इतने पवित्र हैं?

कहीं हमारा वहाँ बैठना पाप न हो जाए, उन्होंने कहा। वे मना नहीं कर रहे थे। वे डरे हुए थे।

पूरी बात

इनमें से किसी से पूछिए कि वे क्या हैं, तो बरसों तक जवाब में सिर्फ़ एक शब्द होता था।

पिता नहीं। भाई नहीं। बेटा नहीं, पड़ोसी नहीं, वह आदमी नहीं जिसने पिछली गर्मी में आपकी मोटर ठीक की थी। बस नशेड़ी। गाँव आपको यही पूरा नाम देता है, और एक बार दे दिया तो आप उसी नाम पर बोलते हैं। शादी में नहीं बुलाया जाता। बच्चे के नामकरण में नहीं बुलाया जाता। जिस दिन पूरी गली ख़ुश होती है, उस दिन सब चाहते हैं कि आप घर में ही रहें।

तो जब हमने बताया कि हवन होगा और उसमें वे बैठेंगे, तो कई लोग अलग से हमारे पास आए। उन्होंने मना नहीं किया। उन्होंने जो कहा वह मना करने से ज़्यादा डरावना था।

कहीं हमारा वहाँ बैठना पाप न हो जाए।

समझिए कि यह वाक्य कितना महँगा है। ये वे लोग हैं जो उस अग्नि से प्रेम करते हैं। ये उसी के पास बड़े हुए हैं। पढ़ना सीखने से पहले इनकी दादी ने इन्हें उसके आगे हाथ जोड़ना सिखाया था। और कहीं रास्ते में इन्हें यह यक़ीन हो गया, क्योंकि सौ छोटे-छोटे बेज़ुबान तरीक़ों से इन्हें यही बताया गया था, कि इनके होने से वह अग्नि अपवित्र हो जाएगी।

इन्हें हिलाने में लगातार भरोसा लगा। मनाना नहीं। बार-बार यह कहते रहना कि इन्हें चाहा जा रहा है, और वह अग्नि जितनी किसी की है उतनी ही इनकी भी है।

और फिर, ऐसे ज़िले में जो अपनी बेटियों को यज्ञ के पास बैठने नहीं देता और जिसने कभी किसी बेटी को यज्ञ कराते नहीं देखा, हमारी टीम की युवतियों ने पूरा अनुष्ठान संपन्न कराया। व्यवस्था उन्होंने की। न्योता उन्होंने दिया। अग्नि के पास बैठकर पुरोहित का काम उन्होंने किया।

और जिन लोगों ने पूछा था कि क्या वे इतने पवित्र हैं, उन्हीं को यजमान के आसन पर बिठाया गया। वही, जिनके लिए अग्नि जलती है। जिनके नाम पर हर आहुति दी जाती है। जिनके बिना अनुष्ठान होता ही नहीं।

उन्हें किनारे पर जगह नहीं दी गई। उन्हें बीच में बिठाया गया। उनके नाम लेकर प्रार्थना की गई, और फिर उनसे कहा गया कि अब वे उस आँगन में बैठे बाकी सबके लिए प्रार्थना करें।

शामियाने के नीचे एक उम्रदराज़ प्रतिभागी झुककर टीम की एक युवती के सिर पर हाथ रखते हुए, पास में दीपक और थाली।
०९

क्या हमारी बेटियाँ भी यह सीख सकती हैं?

दक्षिणा देने को पैसा नहीं था। तो जो बचा था, वही दे दिया।

पूरी बात

अग्नि शांत हुई तो वे सीधे उन्हीं युवतियों के पास आए जिन्होंने अनुष्ठान कराया था।

और वे शर्मिंदा थे, क्योंकि जो आपका अनुष्ठान कराए उसे दक्षिणा दी जाती है, और उनमें से किसी के पास एक रुपया नहीं था।

तो उन्होंने वही दिया जो बचा था। अपनी ही बेटियों की उम्र की लड़कियों के सिर पर हाथ रखा, और आशीर्वाद दे दिया।

और फिर उनमें से एक ने वह सवाल पूछा।

क्या हमारी बेटियाँ भी यह सीख सकती हैं?

उस दिन किसी को बेटियों की क़ीमत पर भाषण नहीं दिया गया। किसी से नहीं कहा गया कि तुम्हारे रीति-रिवाज़ पिछड़े हैं। बाहर से किसी ने किसी को सुधारा नहीं। उन्होंने देखा, और भीतर कुछ पलट गया, और वे यह तय करके घर लौटे कि उनकी अपनी बेटियाँ भी उस अग्नि के पास बैठना सीखेंगी।

इलाक़े की एक बदनामी है। इन लोगों की नहीं। एक ही दोपहर में इन्होंने वह बदल दिया जो कोई अभियान और कोई बाहरी नहीं बदल पाया था, और अपने आप बदला, क्योंकि वे चाहते थे।

हम उस ज़िले में अफ़ीम की लत का इलाज करने गए थे। अध्ययन यही नापता है और इसी का बचाव हम किसी के भी सामने करेंगे।

पर शिविर असल में कभी नशे के बारे में होता ही नहीं। वह इस बारे में होता है कि जब इंसान के पास बचाने को कुछ नहीं रह जाता, तब उसमें क्या-क्या मुमकिन हो जाता है।

रेत के आँगन में उकड़ूँ बैठी युवा प्रशिक्षिका, मैट पर बैठे उम्रदराज़ व्यक्ति को अनुलोम-विलोम की मुद्रा दिखाते हुए।
१०

जैसे बेटी अपने पिता को सँभालती है

वे सुन रहे हैं। ध्यान से। उससे।

पूरी बात

यहाँ किसी का मज़ाक़ नहीं बनता। किसी को यह महसूस नहीं कराया जाता कि वह धीमा है।

देखिए यह होता कैसे है। एक युवती अपने दादा की उम्र के आदमी के पास उकड़ूँ बैठ जाती है और दिखाती है कि उँगलियाँ कहाँ रखनी हैं, और फिर से दिखाती है, और इंतज़ार करती है।

बिल्कुल वैसे जैसे बड़ी हो चुकी बेटी अपने बूढ़े पिता को वह चीज़ करा देती है जो अब उनसे नहीं होती। पास बैठकर, बिना जल्दी के, बिना ज़रा भी झुँझलाहट के, और सबसे बड़ी बात, उन्हें इसकी ज़रूरत पड़ने पर छोटा महसूस कराए बिना।

याद रखिए यह कहाँ हो रहा है। यह दुनिया का वह हिस्सा है जहाँ लड़की से किसी चीज़ की अगुवाई की उम्मीद नहीं की जाती, और अपने से बड़ों को सिखाने की तो बिल्कुल नहीं।

अब उनका चेहरा देखिए, जब वह उन्हें सिखा रही है।

वे सुन रहे हैं। ध्यान से। उससे।

इसके लिए किसी ने उनसे बहस नहीं की। यह इसलिए हुआ कि वह धैर्य से बता रही थी और उसे आता था, और इसलिए कि उन्हें अब यह ज़रूरत नहीं रह गई थी कि जानने वाले वही हों।

शामियाने के नीचे रंगीन मैटों पर बैठा प्रतिभागियों का छोटा घेरा, बीच में प्रशिक्षिका, एक व्यक्ति चेहरे पर कपड़ा लिए अभ्यास करते हुए।
११

हर सवाल एक पूँजी है

जो आदमी सवाल पूछता है, उसने तय कर लिया है कि वह कल भी यहीं होगा।

पूरी बात

यह सहभागी-नेता प्रशिक्षण है, और सबसे पहले यह देखिए कि सिखा कौन रहा है।

उम्र की कोई शर्त नहीं है। बड़े-बुज़ुर्ग भी अगुवाई करते हैं, और छोटे बैठकर उनसे सीखते हैं, और फिर बात उलट जाती है। हमारी एक प्रशिक्षिका घेरे में हैं, घेरे के आगे नहीं, और वहीं बोलती हैं जहाँ ज़रूरत पड़े।

दूसरी बात यह देखिए कि यहाँ सवाल का होता क्या है।

कुछ भी टाला नहीं जाता। कोई सवाल बहुत मामूली, बहुत दोहराया हुआ या बहुत ज़ाहिर नहीं होता। हर एक सवाल को क़ीमती माना जाता है, क्योंकि वह है।

इस काम में सवाल रुकावट नहीं होता। वह दिन की सबसे अच्छी ख़बर होता है।

उनके चेहरे देखिए। देखिए वे कितने सहज हैं, आगे झुके हुए, एक-दूसरे को सुनते हुए, और दूसरे मर्दों के सामने अपनी बात कहते हुए। ये वे लोग हैं जिनके बारे में बरसों बात हुई, जिनसे बात कभी नहीं हुई।

और यहाँ भी उस घेरे के भीतर एक युवती है और उसमें बैठा हर आदमी उसे सुन रहा है। उस ज़िले में यह छोटी बात नहीं है। बदलाव यही है, जो चुपचाप हो रहा है, जबकि सब साँस की बात करने में लगे हैं।

शामियाने के नीचे रंगीन मैटों पर भुजंगासन करते प्रतिभागी, एक उम्रदराज़ साथी अगुवाई करते हुए, पास खड़े प्रशिक्षक।
१२

अपना एक समाज

जिस समाज ने उन्हें निकाला था, वही समाज उन्हीं निकाले हुए लोगों से दोबारा खड़ा हो गया।

पूरी बात

यह उन्होंने तीस दिन, रोज़ किया, और प्रशिक्षण का पूरा आख़िरी चरण इसी पर खड़ा था।

नियम सीधा था। भूमिकाएँ बदलती रहेंगी। न कोई हमेशा मदद करने वाला रहेगा, न कोई हमेशा मदद लेने वाला। आज सुबह आप सिखाएँगे, और कल सुबह जिन्हें आपने सिखाया वे आपको सिखाएँगे। बड़े-बुज़ुर्ग उतनी ही बार अगुवाई करते हैं जितनी बार नौजवान।

हमारे प्रशिक्षक और विशेषज्ञ किनारे बैठकर देखते रहे, और सिर्फ़ तब बोले जब बोलना ज़रूरी हो गया। पूरी विधि यही है। उन्हें अकेला कभी नहीं छोड़ा जाता, और उनसे कमान कभी नहीं छीनी जाती।

इसे दोबारा पढ़िए, क्योंकि यह सुनने में जितना लगता है उससे कहीं बड़ा काम कर रहा है।

जिस आदमी को उसके गाँव की हर महफ़िल से निकाल दिया गया था, उसे एक महफ़िल मिल गई है जो उसकी अपनी है। जिस आदमी ने मान लिया था कि अब कोई मदद नहीं करेगा, उसकी मदद बिल्कुल उसी जैसा कोई कर रहा है, और यही इकलौती मदद है जो वह अब भी क़बूल कर सकता है। जिस आदमी को यक़ीन नहीं रहा था कि उसके भीतर कुछ बचा है, वह दूसरों के सामने खड़ा होकर पता लगा रहा है कि बचा है। जिस आदमी के पास उठने की कोई वजह नहीं बची थी, उसे एक वजह मिल गई है, और वह वजह किसी ने उसे दी नहीं है। वह किसी और का सुधार है, उसके सामने मैट पर, इंतज़ार करता हुआ।

जिस समाज ने उन्हें निकाला था, वही समाज एक आँगन में, उन्हीं निकाले हुए लोगों से, दोबारा खड़ा हो गया।

इन सबको बस इतना चाहिए था कि कोई साथ खड़ा हो और यक़ीन करे कि ये कर लेंगे। बाकी ये ख़ुद कर लेते हैं।

धूसर आसमान के नीचे टीम का एक सदस्य कुछ प्रतिभागियों के साथ खड़ा है, एक व्यक्ति हाथ उठाकर बोलते हुए, सबके चेहरे गंभीर।
१३

आख़िरी दिन से पहले की शाम

ख़त्म होने से एक दिन पहले सब बिखरने को था। और फिर बात हम पर आ गई।

पूरी बात

यह हम इस वेबसाइट पर इसलिए डाल रहे हैं कि इसे छोड़ देने से ऊपर लिखा सब कुछ महज़ एक विज्ञापन बन जाता।

प्रशासन की ओर से इन लोगों से एक वादा किया गया था। वह पूरा नहीं हुआ। और पूरा न होने की वजह वही सबसे पुरानी वजह थी: कोई बाद में आया, इन्हें देखा, और तय कर लिया कि ऐसे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, और उसी भाव को पूरी जगह की हवा बना दिया। फिर यही दोबारा हुआ। और फिर तीसरी बार।

ज़रा महसूस कीजिए कि ठीक उस मोड़ पर इसका क्या असर होता है।

वे तीस दिन पूरे कर चुके थे। मुँह अँधेरे उठ चुके थे। कठिन आसनों में टिक चुके थे। एक-दूसरे के सामने अपने भीतर की सफ़ाई कर चुके थे। उस अग्नि के पास बैठ चुके थे जिसके बारे में उन्हें यक़ीन था कि वह उन्हें ठुकरा देगी। वे घर लौटने से एक दिन दूर थे, बदले हुए इंसान की तरह।

और उस आख़िरी हफ़्ते में उनसे, बिना किसी के मुँह से कहे, वही एक वाक्य कह दिया गया जिसे न मानना उन्होंने पूरे महीने सीखा था।

तुम जैसों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

यह उन्हें तोड़ गया। निराशा नहीं। अपमान। वही पुराना, जाना-पहचाना, पूरा का पूरा अपमान, और ठीक उस घड़ी में जब उन्होंने अपनी ढाल नीचे रख दी थी। उन्हें लगा जैसे सब कुछ दोबारा हाथ से निकल गया।

और फिर बात हम पर आ गई।

उन्हें नहीं पता था कि परदे के पीछे क्या हुआ। उन्हें बस इतना दिख रहा था कि यहाँ लाने वाले हम थे, और वादा टूटा है, तो ज़रूर हम ही होंगे। शक फैल गया। पुरानी बातें याद की जाने लगीं। महीने भर का भरोसा एक शाम में बिखरने लगा, और जो लोग सुबह तक हमारे भाई थे वे हमें ऐसे देख रहे थे जैसे हमने उन्हें इस्तेमाल किया हो।

पहले तो हम उनके सामने जा ही नहीं सके। हमने प्रशासन से उनकी बात एक से ज़्यादा बार उठाई थी और कुछ नहीं हुआ था, और उन्हें दिखाने को हमारे पास सिवाय अपनी हार के कुछ नहीं था।

फिर हमें समझ आया कि असल में दाँव पर क्या लगा है, और वह हमारी साख नहीं थी।

अगर इनमें से एक भी आदमी यह मानकर घर लौट जाता कि उसे बहलाया गया, कि यह सब एक नाटक था, कि उसने बेवजह फिर से उम्मीद पाल ली, तो वह वापस अँधेरे में जा रहा था। और दूसरी बार वह उससे बाहर नहीं आता।

उसके आगे अपनी साख खोना कुछ भी नहीं था। तो हम उनके बीच जाकर खड़े हो गए।

हमने अपना बचाव नहीं किया। हमने उन्हें सब कह लेने दिया। इल्ज़ाम, गुस्सा, दुश्मनी, हर वह कड़वी बात जो महीने भर की उम्मीद उलट जाने पर निकल सकती है। हम खड़े रहे, सुनते रहे, और पलटकर जवाब नहीं दिया।

और धीरे-धीरे, क्योंकि वे सब कुछ उससे कहीं ज़्यादा ग़ौर से देखते हैं जितना लोग समझते हैं, उस घेरे में कुछ बदल गया। शोर थम गया। उन्होंने हमारे चेहरे ठीक से देखे। वे पास आए। और किसी ने बिल्कुल दूसरी आवाज़ में पूछा:

आख़िर हुआ क्या है?

तो हमने बता दिया। सब कुछ। क्या वादा हुआ था, किसने कहा था, क्यों नहीं आया, हमने क्या-क्या कोशिश की, और कहाँ हम हार गए। कुछ नहीं छिपाया। कुछ नहीं बचाया। एक भी बात प्रशासनिक कहकर अपने पास नहीं रखी, क्योंकि वह प्रशासनिक थी ही नहीं, वह पूरी तरह इन्हीं की थी। हमें पता था कि ऊपर इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। हम तय कर चुके थे कि वह सस्ता सौदा है।

और जिस पल हमने अपना बचाव करना छोड़ा, सब ख़त्म हो गया।

न कोई जाँच बैठी। न ऊपर से किसी ने माफ़ी माँगी। बस कुछ मिनट, अपने प्रिय लोगों के सामने खड़े होकर, अपनी ही नाकामी का पूरा सच कह देना।

उस आँगन से बादल हट गया और दोबारा नहीं आया।

सत्यमेव जयते। उस शाम हम सही होकर नहीं जीते, न बड़े होकर, न कुछ देकर। हम इसलिए जीते कि हमें उनसे इतना प्रेम था कि इल्ज़ाम सह लेना सस्ता लगा।

हॉल के भीतर प्रतिभागियों ने टीम के एक सदस्य को कंधों पर उठा रखा है, सबके हाथ ऊपर, शोर करते हुए।
अगले दिन धूप में: सफ़ेद पगड़ियों वाले बुज़ुर्ग और टीम के साथी एक नीची दीवार पर साथ बैठे, एक-दूसरे के कंधों पर हाथ रखे, सब हँसते हुए।
१४

हम जीत गए

महीने भर हम उनके पाँव छूते रहे। आख़िरी दिन उन्होंने हमें ज़मीन से उठा लिया।

पूरी बात

अगले दिन उन्होंने हमें उठाकर कंधों पर बिठा लिया।

इन तस्वीरों में जिन्हें उठाया जा रहा है वे प्रतिभागी नहीं हैं। वे हमारी टीम हैं। शोधकर्ता। प्राध्यापक। नाम के आगे-पीछे डिग्रियाँ लगाने वाले लोग, हवा में उठाए जा रहे हैं, उन लोगों के हाथों जो एक महीना पहले यह मानकर आए थे कि वे अग्नि के पास बैठने लायक़ भी नहीं।

समझिए यह मुमकिन कैसे हुआ।

इस शिविर में जो भी आया, अपनी पहचान गेट पर छोड़कर आया। किसान, पिता, कर्ज़दार, कलंक, सब कुछ। छोड़ना पड़ा। ज़मीन के सिवा कहीं और से शुरू किया ही नहीं जा सकता।

तो हमने भी अपनी पहचान गेट पर ही छोड़ दी।

यह शिष्टाचार नहीं है। यह प्रवेश की शर्त है। जिस आदमी से सब कुछ छिन चुका है, उसके सामने आप अपना ओहदा पहने हुए खड़े नहीं हो सकते। वह पल भर में भाँप लेगा और फिर कभी नहीं खुलेगा। डिग्री, विभाग, पद, दूरी, सब उतारना पड़ता है, वरना कुछ नहीं होता।

और जब वह उतर गया तो हम और वे बचा ही नहीं। सिर्फ़ हम सब बचे। हम अँधेरे में उठे। हम एक ही दरी पर बैठे। हमसे ग़लतियाँ हुईं। आख़िरी दिन से पहली शाम हमारी लड़ाई हुई। और हम लौट आए।

महीने भर हमारी टीम उनके पाँव छूती रही। रस्म के तौर पर नहीं। इस साफ़ आदर से कि ये लोग रोज़, एक-दूसरे के सामने, बिना किसी गारंटी के, वह कर रहे थे।

तो जब उन्होंने हमें उठाया, वह कृतज्ञता नहीं थी। वह जवाब था। हम उनके आगे झुके थे, और आख़िरी दिन उन्होंने हमें ज़मीन से उठा लिया।

इन लोगों के पास प्रेम की एक बूँद ले जाइए, ये पूरा समुंदर लौटा देते हैं। यह कहावत नहीं है। यह दूसरी तस्वीर है, शिविर की सबसे बुरी शाम के अगले दिन ली गई, जिसमें सबके हाथ सबके कंधों पर हैं।

हमने प्रेम किया। हम साथ जिए। हम जीत गए।

प्रेम जीत गया।

और भी जुड़ता रहेगा। हर शिविर ऐसी तस्वीरें छोड़ जाता है जिनमें कुछ ऐसा होता है जो देखकर कभी पता नहीं चलेगा। जैसे-जैसे वे कहानियाँ लिखी जाएँगी, यहीं आती रहेंगी। ख़बर चाहिए तो हमें लिखिए
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यह ज़रूर पढ़िए। योग असरदार है, पर वह चिकित्सा का विकल्प नहीं है। हमारे अध्ययन में यह एक आवासीय नशा-मुक्ति कार्यक्रम के भीतर, सामान्य इलाज के साथ दिया गया था, उसकी जगह नहीं। अफ़ीम, शराब और कुछ नींद की दवाओं को अचानक छोड़ना बिना निगरानी के ख़तरनाक हो सकता है, और कभी-कभी जानलेवा भी। अपने आप एकदम से कुछ मत छोड़िए। पहले 14446 पर बात कीजिए या डॉक्टर से मिलिए।