यह हम इस वेबसाइट पर इसलिए डाल रहे हैं कि इसे छोड़ देने से ऊपर लिखा सब कुछ महज़ एक विज्ञापन
बन जाता।
प्रशासन की ओर से इन लोगों से एक वादा किया गया था। वह पूरा नहीं हुआ। और पूरा न होने की
वजह वही सबसे पुरानी वजह थी: कोई बाद में आया, इन्हें देखा, और तय कर लिया कि ऐसे लोगों पर
भरोसा नहीं किया जा सकता, और उसी भाव को पूरी जगह की हवा बना दिया। फिर यही दोबारा हुआ। और
फिर तीसरी बार।
ज़रा महसूस कीजिए कि ठीक उस मोड़ पर इसका क्या असर होता है।
वे तीस दिन पूरे कर चुके थे। मुँह अँधेरे उठ चुके थे। कठिन आसनों में टिक चुके थे। एक-दूसरे
के सामने अपने भीतर की सफ़ाई कर चुके थे। उस अग्नि के पास बैठ चुके थे जिसके बारे में उन्हें
यक़ीन था कि वह उन्हें ठुकरा देगी। वे घर लौटने से एक दिन दूर थे, बदले हुए इंसान की तरह।
और उस आख़िरी हफ़्ते में उनसे, बिना किसी के मुँह से कहे, वही एक वाक्य कह दिया गया जिसे न
मानना उन्होंने पूरे महीने सीखा था।
तुम जैसों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
यह उन्हें तोड़ गया। निराशा नहीं। अपमान। वही पुराना, जाना-पहचाना, पूरा का पूरा अपमान, और
ठीक उस घड़ी में जब उन्होंने अपनी ढाल नीचे रख दी थी। उन्हें लगा जैसे सब कुछ दोबारा हाथ से
निकल गया।
और फिर बात हम पर आ गई।
उन्हें नहीं पता था कि परदे के पीछे क्या हुआ। उन्हें बस इतना दिख रहा था कि यहाँ लाने वाले
हम थे, और वादा टूटा है, तो ज़रूर हम ही होंगे। शक फैल गया। पुरानी बातें याद की जाने लगीं।
महीने भर का भरोसा एक शाम में बिखरने लगा, और जो लोग सुबह तक हमारे भाई थे वे हमें ऐसे देख
रहे थे जैसे हमने उन्हें इस्तेमाल किया हो।
पहले तो हम उनके सामने जा ही नहीं सके। हमने प्रशासन से उनकी बात एक से ज़्यादा बार उठाई थी
और कुछ नहीं हुआ था, और उन्हें दिखाने को हमारे पास सिवाय अपनी हार के कुछ नहीं था।
फिर हमें समझ आया कि असल में दाँव पर क्या लगा है, और वह हमारी साख नहीं थी।
अगर इनमें से एक भी आदमी यह मानकर घर लौट जाता कि उसे बहलाया गया, कि यह सब एक नाटक था, कि
उसने बेवजह फिर से उम्मीद पाल ली, तो वह वापस अँधेरे में जा रहा था। और दूसरी बार वह उससे
बाहर नहीं आता।
उसके आगे अपनी साख खोना कुछ भी नहीं था। तो हम उनके बीच जाकर खड़े हो गए।
हमने अपना बचाव नहीं किया। हमने उन्हें सब कह लेने दिया। इल्ज़ाम, गुस्सा, दुश्मनी, हर वह
कड़वी बात जो महीने भर की उम्मीद उलट जाने पर निकल सकती है। हम खड़े रहे, सुनते रहे, और
पलटकर जवाब नहीं दिया।
और धीरे-धीरे, क्योंकि वे सब कुछ उससे कहीं ज़्यादा ग़ौर से देखते हैं जितना लोग समझते हैं,
उस घेरे में कुछ बदल गया। शोर थम गया। उन्होंने हमारे चेहरे ठीक से देखे। वे पास आए। और
किसी ने बिल्कुल दूसरी आवाज़ में पूछा:
आख़िर हुआ क्या है?
तो हमने बता दिया। सब कुछ। क्या वादा हुआ था, किसने कहा था, क्यों नहीं आया, हमने क्या-क्या
कोशिश की, और कहाँ हम हार गए। कुछ नहीं छिपाया। कुछ नहीं बचाया। एक भी बात प्रशासनिक कहकर
अपने पास नहीं रखी, क्योंकि वह प्रशासनिक थी ही नहीं, वह पूरी तरह इन्हीं की थी। हमें पता
था कि ऊपर इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। हम तय कर चुके थे कि वह सस्ता सौदा है।
और जिस पल हमने अपना बचाव करना छोड़ा, सब ख़त्म हो गया।
न कोई जाँच बैठी। न ऊपर से किसी ने माफ़ी माँगी। बस कुछ मिनट, अपने प्रिय लोगों के सामने खड़े
होकर, अपनी ही नाकामी का पूरा सच कह देना।
उस आँगन से बादल हट गया और दोबारा नहीं आया।
सत्यमेव जयते। उस शाम हम सही होकर नहीं जीते, न बड़े होकर, न कुछ देकर। हम इसलिए जीते कि
हमें उनसे इतना प्रेम था कि इल्ज़ाम सह लेना सस्ता लगा।