बीभत्स · अभिनय · करना

कड़वा · उलटा उत्तर

घिन अपनी पूरी ताक़त में। अभ्यास उससे मुँह फेरना नहीं है। ठहरना है, और उलटा उत्तर देना है।

पास में कुछ नीला हो, धागा या कपड़ा, तो कलाई पर बाँध लो। भरत के यहाँ नीला बीभत्स का रंग है। या जैसे हो, वैसे ही शुरू करो।

पहले शरीर, फिर आवाज़, उसके बाद सिर्फ़ भीतर। कोई भी, कभी भी; कुछ बंद नहीं है।

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भरत के यहाँ भयानक बीभत्स से उपजता है (६.३९)। वह राह किसी और दिन के लिये है।

माला

यह क्यों

भरत किसी भाव को चार तरह से दिखाते हैं, चार अभिनय: शरीर से (आङ्गिक), आवाज़ से (वाचिक), जो पहना जाए उससे (आहार्य), और भीतर से (सात्त्विक) (अभिनयदर्पण ३८; घोष, १९५७)। यह अभ्यास इन्हें बाहर से भीतर की ओर चलता है।

भरत के यहाँ घिन उन दृश्यों, स्वादों, गन्धों, स्पर्शों और आवाज़ों से आती है जो बेचैन करते हैं (६.७३)। वह दिखती है मुँह और आँखें सिकोड़ने में, नाक ढकने में, सिर झुकाने में (६.७४), और सारे अंग भीतर खींच लेने में (७.२६)। इसलिये अभ्यास एक स्वाद से शुरू होता है, और स्क्रीन पर वही भीतर खिंचना है।

श्री अरविन्द, The Life Divine में (CWSA 21, पृ. ११३), अंग्रेज़ी में: “There is no real obligation on us to return to a particular contact a particular response of pleasure, pain or neutral reaction, there is only an obligation of habit.” और: “It is within our competence to return quite the opposite response”. किसी स्पर्श को सुख, दुःख या उदासीनता का कोई ख़ास उत्तर देना हमारी मजबूरी नहीं, बस आदत की मजबूरी है; बिल्कुल उलटा उत्तर देना हमारे बस में है। उलटा उत्तर यही दो वाक्य हैं, जीभ और साँस को दिये हुए।

भरत के यहाँ बीभत्स का रंग नीला है (६.४२ से ४३), उसके देवता महाकाल (६.४४ से ४५), उसका स्वर धैवत, इसलिये छोड़ी साँस पर नीचा ध बजता है, और खुली लता सा पर उत्तर देती है।

कड़वी चीज़ तुम चुनो; नीम की पत्ती और मेथी बस वह है जो यहाँ ज़्यादातर रसोइयों में होता है। कितनी लंबी साँस, लंबी गिनी जाए, यह हमारा है। यहाँ जो भी करते हो, वह न रखा जाता है, न कहीं भेजा जाता है।

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