शृङ्गार · अभिनय · करना

छूना नहीं · बिना लिये

चाह अपनी पूरी मिठास में। अभ्यास चाहना बंद करना नहीं है। उसे बिना लिये खिलने देना है।

पास में कुछ हल्का हरा हो, धागा या कपड़ा, तो कलाई पर बाँध लो। भरत के यहाँ हल्का हरा शृङ्गार का रंग है। या जैसे हो, वैसे ही शुरू करो।

पहले शरीर, फिर आवाज़, उसके बाद सिर्फ़ भीतर। कोई भी, कभी भी; कुछ बंद नहीं है।

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भरत के यहाँ हास्य शृङ्गार से उपजता है (६.३९)। वह राह किसी और दिन के लिये है।

माला

यह क्यों

भरत किसी भाव को चार तरह से दिखाते हैं, चार अभिनय: शरीर से (आङ्गिक), आवाज़ से (वाचिक), जो पहना जाए उससे (आहार्य), और भीतर से (सात्त्विक) (अभिनयदर्पण ३८; घोष, १९५७)। यह अभ्यास इन्हें बाहर से भीतर की ओर चलता है।

श्री अरविन्द, एक पत्र में, जिसे लिखने वाला अपनी चीज़ों को लेकर बेचैन था (Letters on Yoga IV, CWSA 31, पृ. २५४), अंग्रेज़ी में: “Ananda is one thing and vital enjoyment is another. One can have the rasa of a beautiful thing, for instance a picture, without wanting or needing to possess it or turn it to one’s own purpose.” आनन्द एक चीज़ है, प्राण का भोग दूसरी; किसी सुन्दर चीज़ का रस लिया जा सकता है, उसे पाने या अपने काम में लाने की चाह के बिना। फूल वही एक वाक्य है, हाथ को दिया हुआ।

गीता कहती है कि जो इन्द्रियों के विषयों को आहार नहीं देता, उससे विषय छूट जाते हैं, पर उनका रस बना रहता है; रस भी तब जाता है जब परम दिख जाए, रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते (२.५९)। यहाँ चाह को रोकने को नहीं कहा जाता। उसे चखने को कुछ बड़ा दिया जाता है।

भरत के यहाँ शृङ्गार बिना जल्दी का है (१९.४३ और १९.५८ से ५९), उसके स्वर मध्यम और पञ्चम, इसलिये फूल बाँसुरी पर म और प के साथ खिलता है। उसका रंग श्याम है, जिसे घोष हल्का हरा कहते हैं (६.४२ से ४३), और उसके देवता विष्णु (६.४४ से ४५)।

कितना पास, पास गिना जाए, और कितना धीमा, धीमा, यह हमारा है। यहाँ जो भी करते हो, वह न रखा जाता है, न कहीं भेजा जाता है।

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