६ · उसके आसपास का जीवनपहले दिन

भव · इसका अभ्यास: पहले दिन

झूले को जाने की जगह दीजिए

सुबह पहले चरण के पाँच, जितना आज शरीर दे, रेखा-गति पहले; फिर सूक्ष्म अभ्यास; फिर शवासन, जब तक साँस और धड़कन बैठ न जाएँ। शाम को सिर्फ़ सूक्ष्म, धीमे। खाने के बाद चुप्पी, धीमी सैर, और चुप्पी में बिस्तर। इन दिनों कपालभाति नहीं।

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सुबह

1

पहले चरण के पाँच · रेखा-गति पहले

रेखा-गति पहले: एड़ी से उँगली, आँखें सामने, पचास आगे और पचास पीछे। यह ध्यान माँगती है, ताक़त नहीं।

फिर बाक़ी चार, क्रम से, जहाँ तक आज शरीर जाने दे। जिस दिन कम हो, बस रेखा-गति काफ़ी है; जिस दिन ज़्यादा, इंजन दौड़ और कूद भी। कपालभाति इन दिनों में नहीं।

खोलिए
2

सूक्ष्म अभ्यास · सिर से पैर तक

एक-एक जोड़, धीमे, हर एक के साथ साँस: गला, आँखें, गाल, कान, गर्दन, कंधे, कोहनियाँ, कलाइयाँ और उँगलियाँ, छाती, पेट, कमर, घुटने, टख़ने और पंजे। मॉड्यूल की अपनी गिनती से, जहाँ तक आज आराम से हो।

कपोल, कर्ण, स्कंध, पूर्ण-भुज, उदर का पाँचवाँ, जंघा और पिंडली में साँस रोकी जाती है। जब तक कोई भी अफ़ीम चल रही है, रुकना छोटा, आराम तक; और रुकने के बाद साँस कभी झटके से बाहर नहीं।

पहली बार शिविर में किसी सिखाने वाले के साथ। इसके चित्र अभी नहीं हैं; यह शब्दों में है, मॉड्यूल के अपने विवरण से।

3

शवासन · दिल के बैठने तक

पीठ के बल, पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में, हथेलियाँ ऊपर, आँखें बंद।

पंजे भारी होने दीजिए, फिर पिंडलियाँ, फिर जाँघें, पीठ, कंधे, चेहरा। साँस को अपने-आप धीमा होने दीजिए; उसे गिनिए मत।

घड़ी नहीं: तब तक, जब तक साँस और धड़कन बैठ न जाएँ। धड़कन कान से उतरकर छाती में आ जाए, तब उठिए, दाईं करवट से।

शाम

4

सूक्ष्म अभ्यास · सिर्फ़ यही, और धीमे

सुबह वाला ही क्रम, सिर से पैर तक, पर और धीमा, और कम गिनती में। कोई ज़ोर नहीं: शाम ज़ोर ख़र्च करने के लिए नहीं, उसे समेटने के लिए है।

साँस रोकने वाले अभ्यास शाम को छोड़ दीजिए, या बहुत छोटे रखिए।

शाम के खाने के बाद

5

चुप्पी, धीमी सैर, चुप्पी में बिस्तर

शाम का खाना चुपचाप, धीरे, थोड़ा। फिर एक धीमी सैर, बिना बात के, इतनी धीमी कि साँस न चढ़े।

फिर चुप्पी में बिस्तर: कोई बहस नहीं, कोई फ़ोन नहीं। नींद का पीछा मत कीजिए; बस चौकसी में और कुछ मत जोड़िए।

रात को टाँगें टिकें नहीं, तो उठकर फिर रेखा-गति, धीरे, और फिर शवासन। ज़ोर को रास्ता दीजिए।

घर पर

6

घर पर, पहले दिन

यही क्रम: सुबह रेखा-गति और जितना शरीर दे, फिर शवासन; शाम को सूक्ष्म; खाने के बाद चुप्पी।

घर में किसी एक को बता दीजिए कि ये दिन क्या हैं: दूसरे से चौथे दिन सबसे भारी, फिर नीचे। दिन भर थोड़ा-थोड़ा पानी।

7

डॉक्टर, कब

छाती में दर्द, बेहोशी, या आराम में भी दिल बैठे नहीं: पहले डॉक्टर।

उल्टी या दस्त दिन भर, और पानी न टिके; या उलझन, या ऐसी चीज़ें दिखें जो नहीं हैं: उसी दिन डॉक्टर।

डॉक्टर ने इन दिनों के लिए दवा दी हो, तो उसे वैसे ही लेते रहिए। यह अभ्यास उसके साथ चलता है। मदद लेना हारना नहीं।

यह क्रम क्यों

छोड़ने में चौकसी ऊँची और दिल को शांत करने वाली नस धीमी मिली, और ओपिऑइड छोड़ते आदमियों में योग ने उस नस को लौटाने में मदद की। हरकत से बेचैनी और चिड़चिड़ापन घटे, और छोड़ने की बीमारी सबसे ज़्यादा तेज़ मेहनत से; शवासन में मेहनत के बाद दिल जल्दी लौटा; और कपालभाति बीमारी के दिनों में कर पाना संभव नहीं मिली, इसलिए वह दूसरे चरण तक रुकती है।

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शुरू करने से पहले

अपनी सुविधा के भीतर ही कीजिए। ज़रा भी दर्द हो तो रुक जाइए। यह इलाज का साथ देता है, उसकी जगह नहीं लेता; जो ब्यूप्रेनॉर्फ़िन या मेथाडोन पर है, वह उस पर बना रहे।

जब तक अफ़ीम चल रही है, हर बार साँस रोकना छोटा रखिए।

पत्र · श्रीअरविन्द का एक पत्र

एक शिष्य को; पत्र यह नहीं बताता कि किसे, या क्या पूछा गया था। संपादकों ने इसे नशे की चीज़ों (Intoxicants) के शीर्षक के नीचे रखा है।

श्रीअरविन्द ने यह पत्र अंग्रेज़ी में लिखा था, और यहाँ यह उन्हीं के शब्दों में है। आश्रम का हिन्दी अनुवाद अभी हमारे पास नहीं है, और उनके शब्दों का अनुवाद हम स्वयं नहीं करते।

It is the habit in the subconscient material that feels an artificial need created by the past and does not care whether it is harmful or disturbing to the nerves or not. That is the nature of all intoxications (wine, tobacco, cocaine etc.), people go on even after the deleterious effects have shown themselves and even after all real pleasure in it has ceased because of this artificial need (it is not real). The will has to get hold of this subconscient persistence and dissolve it.

श्रीअरविन्द, Letters on Yoga IV (संपूर्ण ग्रंथावली, खंड ३१), पृष्ठ ४३५

यह यहाँ क्यों है

यह अकेली जगह है जहाँ वे नशे के बारे में सीधे लिखते हैं। वे कहते हैं कि यह ज़रूरत अतीत से बनी शरीर की एक आदत है, सच्ची ज़रूरत नहीं; वे किसी दुश्मन का नाम नहीं लेते, बस एक टिकी हुई आदत, जिसे संकल्प घोल देता है। पहले दिन उस आदत को जाने की जगह देते हैं। यह पढ़ना हमारा है।

पूरी पुस्तक, आश्रम की साइट पर (अंग्रेज़ी में) →

दूसरा घेराशरीर