रस · अद्भुत

अभिभूत, विस्मय

जो बहुत बड़ा है, उसके सामने हाथ उठते हैं, फिर सिर झुकता है।

यदि मनुष्य इस बातकी केवल एक झलक पा जायं कि कितने अनंत भोग, कितनी पूर्ण शक्तियां, सहज-स्वाभाविक ज्ञानके कितने ज्योतिपूर्ण क्षितिज, हमारी सत्ताके कितने विस्तृत शांतिपूर्ण क्षेत्र उन प्रांतोंमें हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं जिन्हें अभीतक हमारे जैव क्रम-विकासने जीता नहीं है, तो वे सब कुछ छोड़ देंगे और तबतक कभी चैनसे नहीं बैठेंगे जबतक इन संपदाओंको आयत्त नहीं कर लेते। परंतु पथ संकीर्ण है, द्वार दुर्भेद्य है और प्रकृतिके पहरेदार भय, अविश्वास और संशय मौजूद हैं ताकि हमें कम सामान्य चरागाहोंकी ओरसे पैर मोड़नेसे मना करें।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ५ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. १२) पूरा प्रसंग →

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१कथा

राहकौसल्या, जिन्होंने दो बालक देखे, और फिर उन्हें पूरा

निसि दिन

अयोध्या में कौसल्या अपने नन्हे बेटे के लिये जीती थीं। उसे गोद में झुलातीं, पालने में लिटाकर झुलातीं, और उसकी लीलाएँ गातीं, और दिन-रात कब बीतते, उन्हें पता न चलता। 200

प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।

सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥

रामचरितमानस, बालकाण्ड 200

दो बालक

एक दिन उन्होंने उसे नहलाया, सजाया, और पालने में सुला दिया। फिर स्वयं स्नान करके कुल के इष्टदेव भगवान की पूजा की, नैवेद्य चढ़ाया, और रसोई में चली गईं। लौटकर पूजा के स्थान पर आईं तो बेटे को वहाँ नैवेद्य खाते देखा। डरकर वे पालने की ओर भागीं। वह वहाँ सोया था। फिर लौटकर आईं: बेटा वहीं था। 201.1 से 3

गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥

बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥

इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥

देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥

रामचरितमानस, बालकाण्ड 201.3 से 4

रोम रोम

देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।

रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥

रामचरितमानस, बालकाण्ड 201

अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥

काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥

रामचरितमानस, बालकाण्ड 202.1

उन्होंने माया को देखा, हर प्रकार से घनी, अत्यंत डरी, हाथ जोड़े खड़ी। उन्होंने वह जीव देखा जिसे माया नचाती है, और वह भक्ति देखी जो उसे छुड़ाती है। 202.2

फिर शिशु

तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥

बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥

रामचरितमानस, बालकाण्ड 202.3

वे स्तुति भी न कर सकीं; डर गईं। जगत के पिता, और मैंने उन्हें अपना बेटा समझा। और हरि ने माँ को हर तरह समझाया, और कहा: सुनो माँ, यह किसी से मत कहना। 202.4

बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।

अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥

रामचरितमानस, बालकाण्ड 202

बहुत अधिक

यह दीया उसके लिये है जो अभिभूत है। कुछ बहुत बड़ा एक साथ आ गया है: बरसों बाद की पहली साफ़ सुबह, एक भाव जिसका उसके पास नाम नहीं, आगे जो है उसका आकार, पीछे जो है उसका आकार। यह उसे वैसे ही हिला देता है जैसे इसने उन्हें हिलाया था। उसका हृदय काँपता है और मन ठहरता नहीं।

कौसल्या का डरना ग़लत नहीं था। तुलसी इसे सीधे कहते हैं: वे काँपीं, बोल न सकीं, आँखें मूँद लीं। इतना बड़ा विस्मय भय के साथ आता है; भागवत की यशोदा ने भी यही अनुभव किया। कथा में कोई उनसे और साहसी होने को नहीं कहता।

और भगवान ने उन्हें वहीं नहीं छोड़ा। पहले वे उनके डर पर धीरे से हँसे। फिर उन्हें अभिभूत देखकर फिर छोटे हो गए, एक बालक जिसे वे गोद में ले सकें। वह पूरा अब भी वहीं था; बस उसने वह आकार ले लिया जो वे उठा सकें। इस दीये से यही राह है: विस्मय को रोकना नहीं, उसे एक साँस, एक पंक्ति, पालने के एक बालक के आकार तक उतरने देना, और वहाँ से आगे चलना।

कथा: तुलसीदास, रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 200 से 202, गीता प्रेस, गोरखपुर के मूल संस्करण के छपे पृष्ठ 89 पर पढ़ी गई। कहना हमारा है, और इसका उसके लिये क्या अर्थ है, यह भी।

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२अभिनय

पहले, चाहो तो: ऊपर देखो →ऊपर देखो, और जो कभी न दिखा हो, उस पर एक थाप दो। फिर बैठक के लिये यहीं लौट आओ।

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४वाणी

श्रीमाँ की डायरी, प्रार्थना और ध्यान, का एक पूरा पन्ना, जैसा उन्होंने इस दिन लिखा: भगवान् से एक प्रार्थना, यहाँ पूरी। यह इस दीये पर है, यह हमारा चुनाव है।

श्रीमाँ · ४ जुलाई, १९१४

हे चरम शक्ति, विजयी सामर्थ्य, पवित्रता, सौंदर्य, परात्पर प्रेम! ऐसी कृपा कर कि यह अखंड सत्ता, यह समग्र शरीर श्रद्धा-भक्तिके साथ तेरे निकट पहुंचे और पूर्ण तथा विनम्र आनुगत्यके साथ सर्वांगपूर्ण अभिव्यक्तिके इस उपकरणको तुझे अर्पित कर दे, जो, यदि अभी इस सिद्धिके लिये पूर्णतः परिपक्व न हो तो भी, तेरी इच्छाके प्रति निवेदित तो हो ही चुका है . . . .।

इस शांति और दृढ़ विश्वासके साथ कि एक दिन तू अपेक्षित चमत्कारको अवश्य पूरा करेगा तथा अपने परम ऐश्वर्यको पूर्ण रूपसे अभिव्यक्त करेगा, हम गंभीर आनंदके साथ तेरी ओर मुड़ रहे हैं और नीरव होकर तुझसे विनती कर रहे हैं . . . .।

विशाल, अनंत, आश्चर्यमय . . . एकमात्र तू ही विद्यमान है और तू ही समस्त वस्तुओंमें चमक रहा है। तेरी सिद्धिका मुहूर्त सन्निकट है। समग्र प्रकृति गंभीरतापूर्वक आत्म-समाहित हो रही है। उसकी तीव्र पुकारका तू उत्तर दे रहा है!

श्रीमाँ, प्रार्थना और ध्यान, पृष्ठ ११३ से ११४

यदि मनुष्य इस बातकी केवल एक झलक पा जायं कि कितने अनंत भोग, कितनी पूर्ण शक्तियां, सहज-स्वाभाविक ज्ञानके कितने ज्योतिपूर्ण क्षितिज, हमारी सत्ताके कितने विस्तृत शांतिपूर्ण क्षेत्र उन प्रांतोंमें हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं जिन्हें अभीतक हमारे जैव क्रम-विकासने जीता नहीं है, तो वे सब कुछ छोड़ देंगे और तबतक कभी चैनसे नहीं बैठेंगे जबतक इन संपदाओंको आयत्त नहीं कर लेते। परंतु पथ संकीर्ण है, द्वार दुर्भेद्य है और प्रकृतिके पहरेदार भय, अविश्वास और संशय मौजूद हैं ताकि हमें कम सामान्य चरागाहोंकी ओरसे पैर मोड़नेसे मना करें।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ५ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. १२)

विचार और सूत्र से: लगभग १९१३ में श्रीअरविन्द ने इन्हें एक कॉपी में लिखा, तीन शीर्षकों में, ज्ञान, कर्म और भक्ति, और कभी छपने के लिये तैयार नहीं किया। श्रीमाँ ने १९५८ से १९७० तक इन्हें एक-एक करके पढ़ा और उन पर बोलीं; वही 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में है। नीचे: इस पंक्ति के साथ क्या खड़ा है, उस पर उनकी टिप्पणी, और यह यहाँ क्यों है।

इस पर, श्रीमाँ

श्रीअरविन्दने जो लिखा है, “झलक पा जायं”, तो उसका अर्थ है “संपूर्ण रूपसे देख लें, पर थोड़े-से क्षणोंके लिये”। यह स्पष्ट ही है कि यदि इन सुन्दर वस्तुओंका निरंतर दर्शन प्राप्त हो तो वह स्वभावतः तुम्हें पथ ग्रहण करनेके लिये बाध्य करेगा। फिर यह भी निश्चित है कि एक छोटी-सी खंड-झांकी पर्याप्त नहीं होती; उसमें इतनी प्रबल शक्ति नहीं होती कि वह तुम्हें पथ ग्रहण करनेके लिये बाध्य करे। परंतु तुम्हें यदि पूर्ण दर्शन प्राप्त हो जाय, भले ही वह थोड़े समयके लिये ही क्यों न हो, तो तुम उसकी उपलब्धिके लिये आवश्यक प्रयास करनेके लोभको संवरण नहीं कर सकते; परंतु वास्तवमें, पूर्ण दर्शन दुर्लभ होता है। इसी कारण श्रीअरविन्द हमसे कहते हैं: “यदि मनुष्य केवल.....।”

उनकी बात आगे चलती है।

श्रीमाँ, 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. १३

यह यहाँ क्यों है

जो प्रतीक्षा कर रहा है उस पर विस्मय, जो खो गया उस पर नहीं। पूरा पढ़ें तो यह भय, अविश्वास और संशय को भी नाम देता है, जो हमें पुराने चरागाहों में रोकते हैं, और श्रीमाँ की बात आगे उसी भय पर जाती है। यह पढ़ना हमारा है।

हर सूत्र, श्रीमाँ की टिप्पणी के साथ, आश्रम की साइट पर पढ़िये →

एक लम्बी साँस

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५बैठक

हर समूह की सावधानियाँ उसके अपने चरणों के साथ आती हैं।

क्या साथ लेकर चलेंगे?

बैठक

बैठक शुरू कीजिए →

क्या साथ लेंगे, यह चुनिए, फिर बैठक खुलती है।

बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, उठता हुआ, तेज़। फिर हर आसन में थोड़ी धीमी होती जाती है, लगभग छह साँस एक मिनट तक। हर पंक्ति साँस भीतर आते समय मन में पढ़ी जाती है, सफ़ेद, और बाहर जाते समय बोलकर कही जाती है, सुनहरी।

  1. आसनसाहस का एक आसन, जितनी देर आप रहें। विश्राम हमेशा एक स्पर्श दूर है।
  2. साँसअ · उ · म · एक साँस पर तीन ध्वनियाँ
  3. जपवही शब्द, बैठकर।
  4. विश्रामशशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।

या कोई एक, अकेले: आसन · साँस · जप · विश्राम

विश्राम

शशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।

शशाङ्कासनशशाङ्कासन

कूल्हे एड़ियों पर बैठा लीजिए। माथा ज़मीन पर, हाथ आगे फैले हुए। अब मुँह बंद करके तीन बार गुंजन कीजिए।

शवासनशवासन

पैर सीधे कीजिए और पीठ के बल लेट जाइए। पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में। आँखें बंद। अब तीन बार ॐ का उच्चारण कीजिए, और उसकी गूँज पूरे शरीर में महसूस कीजिए।

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६आगे

हर राह शान्त पर, बीच में, ख़त्म होती है। वह राह किसी और दिन के लिये है। →

माला

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यह क्यों

भरत के नाट्यशास्त्र में यह अद्भुत रस है। इसका स्थायी भाव विस्मय है; रंग पीत; देवता ब्रह्मा; स्वर षड्ज, ऋषभ (घोष, खंड १: ६.१७, ६.४२ से ४५, १९.३८ से ४०)। दीया वही रंग रखता है।

भरत इस अवस्था को द्रुत लय, दीप्त काकु और उदात्त व कम्पित उच्चारण देते हैं (घोष, खंड १: लय १९.५८ से ५९ के बाद के गद्य में, पृ. ३५१; काकु १९.५८ से ५९ में, पृ. ३५०; उच्चारण १९.४३ में, पृ. ३४७)। इसलिये बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, उठता हुआ, तेज़। जहाँ यह ख़त्म होती है, धीमी, वह हर अवस्था के लिये एक है: लगभग छह साँस एक मिनट में, वह गति जिस पर माला और योग का मंत्र पढ़ते हुए साँस अपने आप ठहर गई (बर्नार्डी और साथी, BMJ 2001, 323, पृ. 1446 से 1449)। हर अवस्था को वहीं ख़त्म करना हमारा है।

भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।

यह तीव्र अवस्थाओं की साँस है: गुस्सा, उदासी, तलब और विस्मय। किसी को जाने को नहीं कहा जाता। हर एक को एक ध्वनि मिलती है जो बाहर जाती है, और चुप्पी में ख़त्म होती है।

ॐ नमो भगवते: माँ का मंत्र, उस क्षण के लिये जब जो भीतर है वह थामने से बड़ा हो।

प्रह्लाद की नवधा भक्ति (श्रीमद्भागवत ७.५.२३) में से यह बैठक सचमुच ये रूप रखती है: कीर्तन · स्मरण · वन्दन। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।

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तीसरा घेरामन