सारथि

रथ में कोई पहले से बैठा है।

भगवद्गीता, यहाँ साधारण दिनों और बुरी सुबहों के साथी की तरह रखी गई। सात सौ श्लोक, एक मैदान में कहे गए, उस आदमी से जिससे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था।

रुके हुए रथ की लगाम थामे खड़े कृष्ण, अर्जुन की ओर मुड़े हुए, जो फ़र्श पर बैठा है और धनुष उसके पास गिरा है। दूर क्षितिज पर दो सेनाएँ खड़ी हैं।

सेनयोरुभयोर्मध्ये · दो सेनाओं के बीच। वह पहले ही मुड़ चुका है। दूसरे ने अभी नज़र उठाई नहीं है।

यह किताब इस साइट पर क्यों है

गीता किसी मंदिर में नहीं कही गई, किसी जंगल में नहीं। वह दो सेनाओं के बीच की जगह में कही गई, किसी की ज़िंदगी के सबसे बुरे दिन से ठीक पहले वाले मिनट में, उस आदमी से जिसे अभी-अभी पता चला है कि जिस-जिस के सहारे वह जीता आया था, सब एक साथ काम करना बंद कर चुका है।

वह कहता है कि रथ को बीच में ले चलो ताकि मैं देख सकूँ कि मैं करने क्या जा रहा हूँ। और बीच में पहुँचकर वह बिखर जाता है। हाथ काँपते हैं, मुँह सूखता है, धनुष गिरता है, पैरों पर टिका नहीं जाता। और वह यह सब ज़ोर से कहता है, सबके सामने। यही पहला अध्याय है, और अध्याय का नाम इसी पर है।

कोई उससे यह नहीं कहता कि पहले सँभल जाओ। कोई यह नहीं कहता कि ठीक होकर आना। जो उसे जवाब देता है वह पहले से उसी रथ में है, लगाम थामे, उसी मैदान की तरफ़ मुँह किए। सारथि यही होता है। ऊपर किसी आसन पर बैठकर दूर से हिदायत देने वाला नहीं। वह जो चलाता है, जो आप जहाँ जाएँ वहीं जाता है, और जो आपके कहने से पहले ही बैठ चुका था।


और यह आपकी ही क्यों है, यह भी साफ़ कह देते हैं

इस साइट पर किसी को इससे नहीं पहचाना जाता कि उसके साथ क्या हुआ। आदमी अपना सबसे बुरा साल नहीं होता, और हम ज़िंदगी को आगे की तरफ़ पढ़ते हैं, कि इसमें क्या संभव है, न कि पीछे की तरफ़, कि कहाँ बिगड़ी। तो बाक़ी बात भी साफ़ कह देते हैं, क्योंकि यह हिस्सा है ही इसीलिए।

जो आदमी नशे की निर्भरता से गुज़रा है उसने बहुत कुछ खोया है, और हम इससे मुँह नहीं मोड़ेंगे। पर उसके साथ-साथ उसने कुछ ऐसी चीज़ें भी खो दी हैं जो ज़्यादातर लोगों के रास्ते में पूरी उम्र खड़ी रहती हैं। अपने ही गुणों का हिसाब। कोई होने का दिखावा। यह यक़ीन कि मैं सही हूँ। वह हैसियत जिसे हर सुबह बचाना पड़ता है। लोग चालीस साल इन्हें नीचे रखने की कोशिश में लगा देते हैं और नहीं रख पाते। उसने इन्हें रखा नहीं। ये उससे छिन गईं। खुली हथेली तक पहुँचने का यह बहुत कठिन रास्ता है, और फिर भी वह खुली हथेली ही है।

हम यह नहीं कह रहे कि ये ज़िंदगियाँ दूसरों की ज़िंदगियों से बेहतर हैं। हम ज़िंदगियों को एक-दूसरे के तराज़ू में नहीं तौलते और कभी नहीं तौलेंगे। हम इससे कहीं छोटी और कहीं ज़्यादा सटीक बात कह रहे हैं। इस ज्ञान के लिए, इस घड़ी में, वह तैयार है, और ज़्यादातर लोग तैयार नहीं हैं। सुनने को तैयार, क्योंकि और कुछ काम नहीं आया। छोड़ने को तैयार, क्योंकि पकड़ पहले ही छूट चुकी है। सीखने, जानने, बढ़ने, होने को तैयार। जिन सवालों को बाक़ी लोग पूरी उम्र टालते रहते हैं, वे उसके सामने पहले से खड़े हैं और हटते नहीं: मैं कौन हूँ, यह दुनिया क्या है, मैं किसके लिए जी रहा हूँ।

और जो एक नाम उसके पास बचा है, जो नाम बाक़ी सब उसके लिए इस्तेमाल करते हैं, वह पहचान है ही नहीं। वह पहचान का न होना है। और न होना, जगह होती है।


और यह उससे बहुत मिलती-जुलती बात है जो श्री अरविंद गीता के बारे में कहते हैं

Essays on the Gita में यह रखा गया है कि हर शास्त्र में दो चीज़ें एक साथ होती हैं: एक वह जो उसके अपने देश-काल की है और बीत जाएगी, और एक वह जो शाश्वत है और हर युग में टिकती है। वहाँ यह भी है कि जीवित महत्व सिर्फ़ उन्हीं पुस्तकों का रहता है जिन्हें बार-बार नया किया जाता है और फिर से जिया जाता है, और बाक़ी अतीत के स्मारक बनकर रह जाती हैं, जिनके पास देने को कुछ नहीं बचता। इसलिए वह हमसे यह नहीं कहती कि उस समय के लोग इससे क्या समझते थे, वही दोबारा खड़ा करो।

लाभ की बात यह है कि गीता में जो वास्तविक जीवंत सत्य हैं उन्हें खोजा जाए, उनके तात्त्विक रूप से अलग करके; उसमें से वह निकाला जाए जो हमारी या समूचे संसार की सहायता कर सके; और उसे उस सबसे स्वाभाविक और जीवंत रूप और अभिव्यक्ति में रखा जाए जो हमें मिल सके, जो आज के मनुष्य की मनोवृत्ति के अनुकूल हो और उसकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं के काम आए।
श्री अरविंद, Essays on the Gita, Our Demand and Need from the Gita

यह कोई छूट नहीं है जो हम ले रहे हैं। यह निर्देश है, और यह हिस्सा उसी को जितनी सादी हिंदी और अंग्रेज़ी में हमसे बन पड़े, उतनी में निभाने की कोशिश है।

उसी निबंध में एक और बात है जो यहाँ मायने रखती है, और वह बिना किसी शर्त के कही गई है: गीता की शिक्षा सार्वभौमिक है, उसका मूल चाहे जो रहा हो। वह किसी एक धार्मिक व्यवस्था की सम्पत्ति नहीं है, और इन पन्नों पर कहीं यह नहीं कहा गया कि आप किसी के हो जाइए, कुछ मान लीजिए, या जो आप हैं वह होना छोड़ दीजिए। आध्यात्मिक, धार्मिक कभी नहीं। यह नियम इस साइट पर बिना किसी अपवाद के चलता है।

अठारह

अठारह अध्याय, और रथ के पहिये में आरे होते हैं। जो जगमगा रहे हैं वे खुले हुए दरवाज़े हैं। बाक़ी अभी अँधेरे में हैं, और उन्हें धीरे-धीरे खोला जाएगा, कुछ को एक-एक श्लोक करके, और यह पन्ना बढ़ता जाएगा।

अठारह का पहिया · जहाँ दरवाज़ा खुला है वहाँ जलता हुआ

वही रथ, कृष्ण लगाम थामे आगे की ओर देखते हुए, अर्जुन फ़र्श पर सिर झुकाए, पास में गिरा हुआ धनुष।1 दरवाज़ेअर्जुनविषादयोगarjunaviṣādayoga

टूटना। यह सबसे नीचे से शुरू होता है, और उस सबसे नीचे को एक नाम दिया गया है और पहला योग कहा गया है।

ठंडी राख की तह के ऊपर जलती एक छोटी स्थिर लौ।अभी नहींसाङ्ख्ययोगsāṅkhyayoga

आपमें वह क्या है जो मरता नहीं, और पहला आदेश, जो यह है: खड़े हो जाइए।

सूखी धूल में घूमता हुआ आरों वाला बड़ा रथ का पहिया।अभी नहींकर्मयोगkarmayoga

कर्म करना बंद नहीं किया जा सकता। किसी से नहीं होता। तो सवाल कभी यह था ही नहीं कि करें या न करें।

अँधेरे में दूर तक जाती जलते हुए मिट्टी के दीयों की क़तार।अभी नहींज्ञानकर्मसंन्यासयोगjñānakarmasaṁnyāsayoga

यह पहले भी दिया गया है और फिर दिया जाता है, जब और जहाँ इसकी ज़रूरत होती है।

मैदान पर दो घिसे हुए रास्ते, क्षितिज पर एक ही रोशनी पर आकर मिलते हुए।अभी नहींकर्मसंन्यासयोगkarmasaṁnyāsayoga

काम छोड़ देना, और काम को पकड़े बिना करना। इनमें से असली छोड़ना कौन सा है।

ख़ाली ज़मीन पर बिछी घास की चटाई, जिससे दूर जाते पैरों के निशान और लौटते हुए दूसरे निशान।अभी नहींआत्मसंयमयोगātmasaṁyamayoga

आसन, समय और मात्रा। और फिर वही सवाल जो यहाँ सबसे ज़्यादा पूछा जाता है: उस आदमी का क्या होता है जिसने कोशिश की और गिर गया।

मिट्टी के दो घड़े। एक बाहर रखे दीये से रोशन, दूसरा भीतर जलते दीये से दमकता हुआ।अभी नहींज्ञानविज्ञानयोगjñānavijñānayoga

किसी चीज़ के बारे में जानना, और उसे जानना।

अँधेरे मैदान पर रोशनी की एक पतली राह, क्षितिज पर एक बिंदु तक जाती हुई।अभी नहींअक्षरब्रह्मयोगakṣarabrahmayoga

आदमी अंत में किसे थामे रहता है, और वह इस वक़्त उससे क्या माँगता है।

रोशनी के एक विशाल अटूट घेरे के भीतर जलता हुआ एक छोटा दीया।अभी नहींराजविद्याराजगुह्ययोगrājavidyārājaguhyayoga

राजा जैसा रहस्य। कि अभी भी, ठीक जैसे आप हैं वैसे ही, आप कभी इससे बाहर थे ही नहीं।

अनगिनत छोटी रोशनियों से भरा मैदान, जिनमें एक पास और कहीं ज़्यादा चमकीली।अभी नहीं१०विभूतियोगvibhūtiyoga

उसे कहाँ देखा जाए, उस आदमी के लिए जो उसे अभी हर जगह नहीं देख सकता।

चित्र के नीचे छोटा-सा घुटनों के बल बैठा अर्जुन, और उसके ऊपर पूरे आकाश में फैला विश्वरूप।अभी नहीं११विश्वरूपदर्शनयोगviśvarūpadarśanayoga

सब कुछ एक साथ देख लेना, और उसे सह न पाना।

अंजुली बनाए दो हाथ, जिनमें एक छोटी लौ रखी है।अभी नहीं१२भक्तियोगbhaktiyoga

उसके लिए जिसके सिर में कोई विचार नहीं टिकता: प्रेम काफ़ी है, और वही आसान रास्ता है।

रात में जुता हुआ खेत, और उसके ऊपर आकाश में एक शांत खुली आँख।अभी नहीं१३क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगkṣetrakṣetrajñavibhāgayoga

खेत, और खेत को जानने वाला। आप अपना शरीर नहीं हैं, और अपना इतिहास भी नहीं हैं।

तीन बटी हुई लड़ियों की रस्सी, जो नीचे जाकर तीन में खुल जाती है।अभी नहीं१४गुणत्रयविभागयोगguṇatrayavibhāgayoga

वे तीन शक्तियाँ जो अब तक आपको चला रही थीं, और उनसे चलना बंद होने का क्या मतलब है।

उलटा पेड़, जड़ें आकाश में फैलीं और शाखाएँ नीचे ज़मीन तक पहुँचती हुईं।अभी नहीं१५पुरुषोत्तमयोगpuruṣottamayoga

वह पेड़ जिसकी जड़ें ऊपर हैं। जिसके भीतर आप रहते आए हैं, बिना उसका आकार जाने।

एक तना दो शाखाओं में बँटा, एक हरी और ऊपर उठती, दूसरी सूखी और नीचे झुकती।अभी नहीं१६दैवासुरसम्पद्विभागयोगdaivāsurasampadvibhāgayoga

गुणों के दो समूह, और वह ईमानदार सवाल कि आप इनमें से किसे खिलाते आए हैं।

एक क़तार में तीन एक जैसे दीये, लौ छोटी, स्थिर और ऊँची।अभी नहीं१७श्रद्धात्रयविभागयोगśraddhātrayavibhāgayoga

श्रद्धा, भोजन, वाणी और दान, हर एक तीन तरह का। आदमी उसी का बना होता है जिस पर वह भरोसा करता है।

हल्की मुस्कान लिए खड़े कृष्ण, सामने सीधे बैठा अर्जुन हाथ जोड़े उन्हें देखता हुआ, और उसकी छाती में रोशनी का एक छोटा खुला द्वार जिसमें कृष्ण खड़े हैं।अभी नहीं१८मोक्षसंन्यासयोगmokṣasaṁnyāsayoga

सब कुछ एक जगह समेटा हुआ। और आख़िरी बात, जो पहले कुछ नहीं माँगती और जो यह है: शोक मत करो।

इसे कैसे रखा गया है

हर अध्याय एक दरवाज़ा है, और हर अध्याय के भीतर एक श्लोक या श्लोकों का एक छोटा समूह अपने आप में एक दरवाज़ा है, अपनी ही ज़मीन पर खड़ा, जो उसी अंश की बात से बनी है। यहाँ कुछ भी पाठ्यक्रम नहीं है और कुछ भी पूरा करना ज़रूरी नहीं। जिस सुबह कोई सवाल हो उस सुबह एक दरवाज़ा, बस यही पूरा तरीक़ा है।

श्लोक देवनागरी में, फिर लिप्यंतरण में, और फिर सादी भाषा में हैं; वह भावानुवाद है, शब्दानुवाद नहीं। श्री अरविंद के उद्धरण Essays on the Gita से हैं और उनका नाम हमेशा दिया गया है। वे निबंध एक साथ नहीं, अध्याय दर अध्याय, साथ-साथ पढ़े जा रहे हैं, ताकि हर पढ़ना सामने रखे श्लोक के सामने ताज़ा रहे, और जिस अध्याय के लिए निबंध अभी नहीं पढ़ा गया, उससे कुछ उद्धृत नहीं किया गया।

और जब पढ़ना बंद हो → दस मिनट, इस वक़्त जो महसूस हो रहा है उसके हिसाब से