रस · हास्य

हल्का, हँसी

हल्कापन भी साधना है। यहाँ वह खेलता है, और माँ को पुकारता है।

जिस जीवने उच्चतम आनंदको हस्तगत कर लिया है उसके लिये जीवन कोई अशुभ वस्तु या दुःखदायी भ्रम नहीं हो सकता; उसके लिये तो सारा जीवन ही किसी दिव्य प्रेमी तथा बालसखाका लहराता प्रेम और हास्य बन जाता है।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४९२ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३६७) पूरा प्रसंग →

← छह द्वार

१कथा

राहमिट्टी खाने वाला बालक, और उसकी माँ जो उसे डाँट न सकी

कीचड़ में दो बालक

गोकुल में राम और केशव, बलराम और कृष्ण, हाथों और घुटनों के बल रेंगते थे। वे अपने नन्हे पैर गोशालाओं के कीचड़ में घसीटते, अपनी ही पायल की छनछन पर रीझते, हर आते-जाते अजनबी के पीछे चल पड़ते, फिर डरकर माँओं की ओर लपकते। माँएँ उन्हें उठा लेतीं, कीचड़ समेत, जैसे वह कीचड़ चंदन हो। जब वे चलने लगे, तो बछड़ों की पूँछ पकड़ लेते और आँगन भर घसीटे जाते, और स्त्रियाँ घर का काम छोड़कर देखतीं और हँसतीं। 10.8.21 से 24

उलाहने

गोपियाँ झुंड बनाकर यशोदा के पास आईं, जहाँ वे सुन सकें, और उलाहने देने लगीं। 10.8.28 से 29

वत्सान्मुञ्चन्क्वचिदसमये क्रोशसञ्जातहासः स्तेयं स्वाद्वत्त्यथ दधिपयः कल्पितैः स्तेययोगैः।
मर्कान्भोक्ष्यन्विभजति स चेन्नात्ति भाण्डं भिन्नत्ति द्रव्यालाभे सगृहकुपितो यात्युपक्रोश्य तोकान्॥श्रीमद्भागवत 10.8.29

गाय दुहने से पहले ही बछड़े खोल देता है, और जब हम चिल्लाती हैं तो हँसता है। तरकीबें भिड़ाकर हमारा दही और दूध चुराता है, और चुराई हुई मीठी चीज़ें खाता है। बंदरों में बाँटता है, और कोई बंदर न खाए तो मटकी फोड़ देता है। चुराने को कुछ न मिले तो पूरे घर से रूठ जाता है, बच्चों को रुलाता है, और चला जाता है। मटकी ऊँची टँगी हो तो पीढ़े और ओखली जोड़ लेता है। छींके की मटकियों में छेद कर देता है। अँधेरी कोठरी में उसके अपने गहने उसे उजाला देते हैं। 10.8.29 से 30

और इतना सब करके, वे बोलीं, ऐसे बैठा है जैसे इससे सीधा कोई नहीं। और कहते-कहते स्त्रियाँ उसके डरे हुए सुंदर मुख की ओर देखती जातीं; और यशोदा हँस पड़ीं, और उसे डाँट न सकीं। 10.8.31

मिट्टी

एक दिन खेलते-खेलते लड़के, बलराम भी, माँ के पास दौड़े आए: कृष्ण ने मिट्टी खाई है! यशोदा ने उसका हाथ पकड़ा। उन्हें उसकी चिंता थी, और आँखों में दिख रही थी। चोरी-छिपे मिट्टी क्यों खाई, नटखट? तेरे सब साथी यही कहते हैं, और तेरा बड़ा भाई भी। 10.8.32 से 34

नाहं भक्षितवानम्ब सर्वे मिथ्याभिशंसिनः।
यदि सत्यगिरस्तर्हि समक्षं पश्य मे मुखम्॥श्रीमद्भागवत 10.8.35

मैंने नहीं खाई, माँ। ये सब मुझ पर झूठ बोल रहे हैं। अगर ये सच कहते हैं, तो खुद मेरा मुँह देख लो। तो खोल, उन्होंने कहा। और हरि, वे भगवान जिनकी शक्ति को कुछ नहीं रोक सकता, एक नन्हा बालक जो नन्हा बालक होने का खेल खेल रहा था, ने अपना मुँह खोल दिया। 10.8.35 से 36

उसके मुँह में

सा तत्र ददृशे विश्वं जगत्स्थास्नु च खं दिशः।
साद्रिद्वीपाब्धिभूगोलं सवाय्वग्नीन्दुतारकम्॥श्रीमद्भागवत 10.8.37

वहाँ उन्होंने पूरा विश्व देखा: जो चलता है और जो ठहरा है, आकाश और दिशाएँ, पर्वतों, द्वीपों और सागरों समेत गोल धरती, हवा और आग, चंद्रमा और तारे, इन्द्रियाँ और मन, काल और वस्तुओं का स्वभाव। और उसमें उन्होंने व्रज को देखा, और खुद को। वे डर गईं। यह सपना है, उन्होंने पूछा, या भगवान की माया, या मेरी अपनी बुद्धि भटक गई है? और उन्होंने उसे प्रणाम किया जिस तक कोई विचार नहीं पहुँचता। 10.8.37 से 42

तब भगवान ने उन पर अपनी माया फैला दी, वह जो माँ के प्रेम से बनी है। उसी क्षण वे भूल गईं कि क्या देखा था। उन्होंने बेटे को गोद में उठा लिया, और उनका हृदय उसके प्रेम से भर गया, पहले जैसा। 10.8.43 से 44

उसकी हँसी

ज्योतिर्गण ने बरसों जो सुना है उसमें ज़्यादातर डाँट है। घर से, गाँव से, अस्पताल से, खुद से। वह भूल गया है कि उसे हँसने की इजाज़त है, या हँसता है और लगता है उसे इसका हक़ नहीं।

इस कथा में सारे लोकों के स्वामी एक लड़का हैं जो मक्खन चुराता है, माँ से बिना पलक झपकाए झूठ बोलता है और पकड़ा जाता है। भागवत यह मुस्कुराकर कहता है, और उलाहना देने वाली स्त्रियाँ उलाहना देते-देते हँस रही हैं। और यशोदा, जिनके पास डाँटने के सब कारण थे, हँस पड़ीं, और डाँट न सकीं। हँसी उसका बहाना नहीं थी। वह उसे देखने का उनका ढंग थी।

और जब उन्होंने मिट्टी खाने वाले उस बालक के मुँह में देखा, तो उसमें पूरा विश्व था। इस दीये की राह वहीं जाती है: एक हँसी से विस्मय तक, और विस्मय से फिर प्रेम में। उसे हँसने की इजाज़त है, संसार पर और खुद पर। जो भगवान कीचड़ में खेलते हैं, वे उस आदमी से दूर नहीं जो उसमें रहा है।

कथा: श्रीमद्भागवत, 10.8.21 से 45, संस्कृत में, GRETIL के पाठ में (उलरिख़ श्टील) पढ़ी गई; श्लोक संख्या उसी पाठ की है। हिन्दी में कहना हमारा है, और इसका उसके लिये क्या अर्थ है, यह भी।

← छह द्वारअगला: अभिनय →

← छह द्वार

२अभिनय

पहले, चाहो तो: हँसी →एक हा घेरे में घूमता है, जब तक घेरा ख़ुद न हँस पड़े। फिर बैठक के लिये यहीं लौट आओ।

← छह द्वारअगला: स्तोत्र →

← छह द्वार

४वाणी

श्रीमाँ की डायरी, प्रार्थना और ध्यान, का एक पूरा पन्ना, जैसा उन्होंने इस दिन लिखा: भगवान् से एक प्रार्थना, यहाँ पूरी। यह इस दीये पर है, यह हमारा चुनाव है।

श्रीमाँ · १७ मई, १९१४

हे भगवान्! जो मानसिक प्रभाव मेरे ऊपर लदे हुए हैं उन सबसे मुझे मुक्त कर, जिसमें कि, पूर्ण रूपसे स्वतंत्र होकर, मैं तेरी ओर उड़ान भर सकूं।

हे विश्व-पुरुष! प्रत्यक्ष आकारमें अभिव्यक्त हे परम एकत्व! मैं एक अदम्य अभीप्साके वश तेरे हृदयमें जाकर लेट गयी, फिर मैं स्वयं तेरा हृदय ही बन गयी और उस समय मुझे मालूम हुआ कि तेरा हृदय बस एक दिव्य शिशुके सिवा और कुछ नहीं है जो खेलता और विश्वोंकी सृष्टि करता है। तूने मुझे कहा: “एक दिन तू मेरा सर्वोच्च पद प्राप्त करेगी, परंतु अभी तू अपनी दृष्टि पृथ्वीकी ओर फेर।” और पृथ्वीपर अब मैं एक प्रसन्न और खेलते हुए बच्चेके रूपमें विद्यमान हूं।

ये थे वे दो वाक्य जिन्हें मैंने एक प्रकारकी अनिवार्य आवश्यकताके वश लिखे थे। पहला था, मानों प्रार्थनाकी शक्ति केवल तभी परिपूर्ण होगी जब कि वह कागजपर लिख ली जायगी। दूसरा था, मानों उपलब्धि केवल तभी स्थायित्वको प्राप्त हो सकेगी जब कि उसे लेखके रूपमें लिखकर उससे मैं अपने मस्तिष्कको खाली कर दूंगी।

श्रीमाँ, प्रार्थना और ध्यान, पृष्ठ ८५

जिस जीवने उच्चतम आनंदको हस्तगत कर लिया है उसके लिये जीवन कोई अशुभ वस्तु या दुःखदायी भ्रम नहीं हो सकता; उसके लिये तो सारा जीवन ही किसी दिव्य प्रेमी तथा बालसखाका लहराता प्रेम और हास्य बन जाता है।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४९२ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३६७)

विचार और सूत्र से: लगभग १९१३ में श्रीअरविन्द ने इन्हें एक कॉपी में लिखा, तीन शीर्षकों में, ज्ञान, कर्म और भक्ति, और कभी छपने के लिये तैयार नहीं किया। श्रीमाँ ने १९५८ से १९७० तक इन्हें एक-एक करके पढ़ा और उन पर बोलीं; वही 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में है। नीचे: इस पंक्ति के साथ क्या खड़ा है, उस पर उनकी टिप्पणी, और यह यहाँ क्यों है।

इसके साथ, श्रीअरविन्द

श्रीकृष्णमें निवास करनेपर शत्रुता भी प्रेमकी ही एक क्रीड़ा तथा भाइयोंका मल्लयुद्ध बन जाती है।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४९१ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३६७)

इस पर, श्रीमाँ

किसी भी परिस्थितिमें दिव्य संबंध रख सकना परमानंदका रहस्य है।

श्रीमाँ, 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३६८, २१-४-७०

यह यहाँ क्यों है

यहाँ की हँसी आत्मा की है, जीवन के हृदय में, किसी पर हँसना नहीं। उससे पहले का सूत्र और श्रीमाँ की टिप्पणी बताते हैं कि यह कहाँ से आती है: श्रीकृष्ण में निवास, दिव्य संबंध बनाये रखना। यह पढ़ना हमारा है।

हर सूत्र, श्रीमाँ की टिप्पणी के साथ, आश्रम की साइट पर पढ़िये →

एक लम्बी साँस

← छह द्वारअगला: बैठक →

← छह द्वार

५बैठक

हर समूह की सावधानियाँ उसके अपने चरणों के साथ आती हैं।

क्या साथ लेकर चलेंगे?

इस अवस्था का अपना शब्द माँ है।

बैठक

बैठक शुरू कीजिए →

क्या साथ लेंगे, यह चुनिए, फिर बैठक खुलती है।

बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, उजला, बिना जल्दी। फिर हर आसन में थोड़ी धीमी होती जाती है, लगभग छह साँस एक मिनट तक। हर पंक्ति साँस भीतर आते समय मन में पढ़ी जाती है, सफ़ेद, और बाहर जाते समय बोलकर कही जाती है, सुनहरी।

  1. आसनविस्तार, हर आसन एक बार
  2. साँसहंस · साँस के अपने दो अक्षर
  3. जपवही शब्द, बैठकर।
  4. विश्रामशशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।

या कोई एक, अकेले: आसन · साँस · जप · विश्राम

विश्राम

शशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।

शशाङ्कासनशशाङ्कासन

कूल्हे एड़ियों पर बैठा लीजिए। माथा ज़मीन पर, हाथ आगे फैले हुए। अब मुँह बंद करके तीन बार गुंजन कीजिए।

शवासनशवासन

पैर सीधे कीजिए और पीठ के बल लेट जाइए। पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में। आँखें बंद। अब तीन बार ॐ का उच्चारण कीजिए, और उसकी गूँज पूरे शरीर में महसूस कीजिए।

← छह द्वारअगला: आगे →

← छह द्वार

६आगे

हर राह शान्त पर, बीच में, ख़त्म होती है। वह राह किसी और दिन के लिये है। →

माला

← छह द्वार

यह क्यों

भरत के नाट्यशास्त्र में यह हास्य रस है। इसका स्थायी भाव हास है; रंग सित; देवता प्रमथ; स्वर मध्यम, पञ्चम (घोष, खंड १: ६.१७, ६.४२ से ४५, १९.३८ से ४०)। दीया वही रंग रखता है।

भरत इस अवस्था को मध्य लय, विलम्बित काकु और उदात्त व स्वरित उच्चारण देते हैं (घोष, खंड १: लय १९.५८ से ५९ के बाद के गद्य में, पृ. ३५१; काकु १९.५८ से ५९ में, पृ. ३५०; उच्चारण १९.४३ में, पृ. ३४७)। इसलिये बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, उजला, बिना जल्दी। जहाँ यह ख़त्म होती है, धीमी, वह हर अवस्था के लिये एक है: लगभग छह साँस एक मिनट में, वह गति जिस पर माला और योग का मंत्र पढ़ते हुए साँस अपने आप ठहर गई (बर्नार्डी और साथी, BMJ 2001, 323, पृ. 1446 से 1449)। हर अवस्था को वहीं ख़त्म करना हमारा है।

भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।

यह डर और शर्म की साँस है, हल्केपन की, और उस समय की जब पता न चले कि भीतर क्या है। भीतर और बाहर बराबर लंबे हैं, और यह पन्ना साँस को कहीं रुकने को नहीं कहता।

माँ: माँ को पुकारता बच्चा।

इस साइट पर यह काम आता है: कुछ अच्छा नहीं लगता.

प्रह्लाद की नवधा भक्ति (श्रीमद्भागवत ७.५.२३) में से यह बैठक सचमुच ये रूप रखती है: कीर्तन · स्मरण · वन्दन। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।

← अभी भीतर क्या है?

तीसरा घेरामन