सुन्न, कुछ नहीं
सुन्न होना भी एक जगह है। यहाँ से रुका हुआ मन फिर चलने को कहा जाता है।
क्या तुम्हारे निम्न अंग अभी भी पाप और शोकका आघात अनुभव करते हैं? किंतु ऊपर चाहे वे देखें या न देखें तेरी आत्मा राजसी ठाठमें विद्यमान है, शांत, मुक्त और विजेताके गौरवसे परिपूर्ण। निश्चय रख कि अंत आनेसे पहले ही भगवती मां अपने कार्यको कर लेंगी और तेरी सत्ताके उपादानको आनंद और पवित्रतासे परिपूर्ण कर देंगी।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र २८० ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३०७) पूरा प्रसंग →१कथा
राहजड़ भरत, जिसे सब मूर्ख समझते थे›
हिरन
भरत राजा भी थे और ऋषि भी। उन्होंने वन के लिये राज्य छोड़ दिया था, और वहाँ दया से एक अनाथ हिरन के बच्चे को पाला। उससे उन्हें इतना मोह हो गया कि उनकी साधना छूटती गई, और वे हिरन का ध्यान करते हुए मरे, और हिरन बनकर जन्मे। पर उन्हें याद रहा। दुःखी होकर उन्होंने ठीक-ठीक देखा कि वे कैसे गिरे थे, अपनी हिरनी माँ को छोड़ा, और एक पवित्र स्थान के पास चुपचाप रहे, जब तक वह जीवन पूरा न हुआ। 5.8.26 से 31
मूर्ख
फिर वे एक विद्वान ब्राह्मण के पुत्र होकर जन्मे। उन्हें अपने सब जन्म याद थे, और वे डरते थे कि अपनों का मोह उन्हें फिर बाँध लेगा। इसलिये उन्होंने मन भगवान में रखा, और संसार को अपने-आप को पागल, जड़, अंधा और बहरा दिखाया। 5.9.1 से 3
पिता ने उन्हें पढ़ाना चाहा, और वे जान-बूझकर उनके सामने सब उलटा करते रहे। पिता के मरने पर भाइयों ने उनसे आशा छोड़ दी। लोग उन्हें पागल, जड़, बहरा, गूँगा कहते, और वे उन्हें वैसा ही उत्तर देते। कोई भी जो काम देता वे कर देते, मज़दूरी पर या बिना कुछ लिये। जो मिलता खा लेते, कम या ज़्यादा, अच्छा या बासी, जैसे अमृत हो। धूप, हवा और बारिश में नंगी धरती पर पड़े रहते, बिना नहाए, धूल से ढके, और भागवत कहता है कि वे उस महामणि जैसे थे जिसका तेज धूल ने ढक रखा हो। भाइयों ने उन्हें खेतों की रखवाली पर लगाया, और उन्हें यह भी पता न था कि ज़मीन बराबर है या नहीं। और इस सब के बीच, भीतर, वे अपने आत्मा के आनंद में थे, जो किसी बाहरी चीज़ ने नहीं दिया था और कोई बाहरी चीज़ छीन नहीं सकती थी। 5.9.4 से 11
एक रात डाकू उन्हें खेतों से उठा ले गए, देवी भद्रकाली को उनकी बलि देने। वे बँधे हुए उनके सामने बैठे, ऊपर तलवार उठी थी, और वे डरे नहीं। देवी स्वयं मूर्ति से फूट पड़ीं और डाकुओं पर टूट पड़ीं। जो शान्त है, भागवत कहता है, उसकी हर ओर से रक्षा होती है। 5.9.12 से 20
पालकी
सिन्धु और सौवीर के राजा रहूगण इक्षुमती नदी के किनारे यात्रा कर रहे थे, और उनके लोगों को एक कहार कम पड़ रहा था। उन्होंने एक हट्टे-कट्टे युवक को देखा, बैल की तरह बोझ खींचने लायक, उन्होंने सोचा, और उसे पकड़कर राजा की पालकी उसके कंधे पर रख दी। वह उसे उठाकर चला। पर वह एक बाण भर आगे देखकर चलता था, कि किसी जीव पर पैर न पड़े, और पालकी ऊबड़-खाबड़ चलने लगी। 5.10.1 से 2
राजा को क्रोध आया और उन्होंने उसका मज़ाक उड़ाया। अरे भाई, तुम तो बहुत थक गए होगे, इतनी देर से अकेले यह ढोते हुए, तुम जो न मोटे हो, न बलवान, और इतने बूढ़े। वह कुछ न बोला, और पहले की तरह ढोता रहा। पालकी फिर डगमगाई, और राजा चिल्लाए: यह क्या है? तू जीते जी मरा हुआ है। स्वामी की आज्ञा टालता है? मैं तेरा इलाज करूँगा, जैसे दंड देने वाला अपराधी का करता है, और तुझे होश में लाऊँगा। 5.10.5 से 7
वे बोले
तब पहली बार वे बोले, जैसे मुस्कुराते हुए, यद्यपि उनमें मुस्कुराने को कोई गर्व बचा ही नहीं था। तुम जो कहते हो सच है, उन्होंने कहा, यदि यह बोझ मेरा ढोने को होता और यह राह मेरी चलने को। ज्ञानी किसी को उस मांस के ढेर से मोटा नहीं कहते जिसमें वह चलता है। 5.10.8 से 9
स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च।
निद्रा रतिर्मन्युरहं मदः शुचो देहेन जातस्य हि मे न सन्ति॥श्रीमद्भागवत 5.10.10
मोटापा और दुबलापन, तन और मन के रोग, भूख, प्यास, भय, कलह, इच्छा और बुढ़ापा, नींद, सुख, क्रोध, अहंकार, मद और शोक: ये उसके हैं जो देह के साथ जन्मा है। ये मेरे नहीं। 5.10.10
उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां गतस्य मे वीर चिकित्सितेन।
अर्थः कियान्भवता शिक्षितेन स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेषः॥श्रीमद्भागवत 5.10.13
मैं अपनी ही अवस्था में जा चुका हूँ, पागल की तरह, या मतवाले की तरह, या जड़ की तरह। हे वीर, तुम्हारा इलाज मेरा क्या करेगा? तुम मुझे क्या सिखाओगे? जो इससे पार जा चुका, उसे दंड देना पिसे हुए आटे को फिर पीसना है। और इतना कहकर उन्होंने पालकी फिर उठा ली, और ढोते रहे। 5.10.13 से 14
तुम कौन हो
राजा ने सुना, और उनके हृदय की कोई गाँठ खुल गई। वे पालकी से कूदकर उतरे, उस कहार के चरणों में सिर रख दिया, और क्षमा माँगी, राजा होने का सारा अहंकार जाता रहा। 5.10.15
कस्त्वं निगूढश्चरसि द्विजानां बिभर्षि सूत्रं कतमोऽवधूतः।
कस्यासि कुत्रत्य इहापि कस्मात्क्षेमाय नश्चेदसि नोत शुक्लः॥श्रीमद्भागवत 5.10.16
तुम कौन हो जो द्विजों में छिपकर घूमते हो, जनेऊ पहने? मुक्त पुरुषों में से कौन हो? किसके पुत्र, कहाँ से, और यहाँ क्यों? मैं किसी से नहीं डरता, न इन्द्र के वज्र से, न शिव के त्रिशूल से, न यम के दंड से। मुझे डर है तो बस तुम जैसे का अपमान करने का। तुम एक जड़ आदमी की तरह घूमते हो, अनासक्त, अपना ज्ञान छिपाए; तुम्हारी बातें मेरे मन की पहुँच से परे हैं। 5.10.16 से 19
धूल के नीचे
किसी-किसी रात ज्योतिर्गण को कुछ भी महसूस नहीं होता। न गुस्सा, न डर, न शोक: एक सपाटपन, जैसे उसे खाली कर दिया गया हो। उसे जड़, निकम्मा, अधमरा कहा गया होगा, एक बोझ जिसे ढोना पड़ता है। हो सकता है वह खुद यह मान बैठा हो।
यह कथा नहीं कहती कि उसका सुन्नपन शान्ति है। जड़ भरत की जड़ता एक छिपना था, चुना हुआ, जिसके नीचे आत्मा का आनंद था; बरसों किसी पदार्थ के बाद का सपाटपन कुछ और है, और कथा इसका दिखावा नहीं करती। वह जो कहती है वह यह है: जो बाहर से कुछ नहीं दिखता, वह किसी आदमी का माप नहीं। धूल के नीचे एक महामणि थी, और धूल ने उसे कम नहीं किया।
और उसके गिरने में भी कुछ नहीं खोया। एक राजा और ऋषि ने एक हिरन से बहुत मोह किया और हिरन बन गया, और वह उससे याद लेकर निकला, और वही याद उसे मुक्त कर गई। जिसे सब मूर्ख समझते थे, उसी से राजा ने सड़क पर उतरकर पूछा: तुम कौन हो?
यह दीया उस रात के लिये है जब कुछ नहीं होता। यह उससे कुछ महसूस करने को नहीं कहता। यह बस बैठने को कहता है, और जो धूल के नीचे है उसे रहने देने को, दिखे या न दिखे।
कथा: श्रीमद्भागवत, 5.8.26 से 31, 5.9 और 5.10.1 से 19, संस्कृत में, GRETIL के पाठ में (उलरिख़ श्टील) पढ़ी गई; श्लोक संख्या उसी पाठ की है। पाँचवें स्कन्ध का बहुत-सा भाग गद्य है; दिया गया संस्कृत उसका पद्य है। हिन्दी में कहना हमारा है, और इसका उसके लिये क्या अर्थ है, यह भी।
४वाणी
श्रीमाँ की डायरी, प्रार्थना और ध्यान, का एक पूरा पन्ना, जैसा उन्होंने इस दिन लिखा: भगवान् से एक प्रार्थना, यहाँ पूरी। यह इस दीये पर है, यह हमारा चुनाव है।
श्रीमाँ · ७ दिसंबर, १९१२
शांत भावसे जलनेवाली दीपशिखाकी भांति, बिना हिले-डुले सीधे ऊपरकी ओर उठनेवाले सुगंधित धुंएकी भांति मेरा प्रेम तेरी ओर प्रवाहित हो रहा है; और एक बच्चेकी भांति, जो न तो तर्क-वितर्क करता और न किसी तरहकी चिंता ही करता है, मैं पूर्ण रूपसे तेरे ऊपर निर्भर करती हूं जिससे तेरी इच्छा पूर्ण हो, तेरी ज्योति प्रकट हो, तेरी शांति चारों ओर विकीर्ण हो जाय और तेरा प्रेम सारे जगत्को आच्छादित कर दे। जब तू चाहेगा तभी मैं तुझे प्राप्त करूंगी, तेरे साथ एक हो जाऊंगी, बिना किसी भेदभावके ‘तू’ ही बन जाऊंगी। और मैं बिना किसी प्रकारकी अधीरताके उस शुभ घड़ीकी प्रतीक्षा करती हूं तथा अबाध रूपसे अपने-आपको उसकी ओर प्रवाहित होने देती हूं जैसे कोई शांत जलधारा असीम समुद्रकी ओर बढ़ती है।
तेरी शांति मेरे अंदर वर्तमान है और उस शांतिमें मैं ‘शाश्वत’की स्थिरताके साथ केवल तुझे ही सब वस्तुओंमें उपस्थित देखती हूं।
श्रीमाँ, प्रार्थना और ध्यान, पृष्ठ ६ से ७
क्या तुम्हारे निम्न अंग अभी भी पाप और शोकका आघात अनुभव करते हैं? किंतु ऊपर चाहे वे देखें या न देखें तेरी आत्मा राजसी ठाठमें विद्यमान है, शांत, मुक्त और विजेताके गौरवसे परिपूर्ण। निश्चय रख कि अंत आनेसे पहले ही भगवती मां अपने कार्यको कर लेंगी और तेरी सत्ताके उपादानको आनंद और पवित्रतासे परिपूर्ण कर देंगी।
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र २८० ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३०७)विचार और सूत्र से: लगभग १९१३ में श्रीअरविन्द ने इन्हें एक कॉपी में लिखा, तीन शीर्षकों में, ज्ञान, कर्म और भक्ति, और कभी छपने के लिये तैयार नहीं किया। श्रीमाँ ने १९५८ से १९७० तक इन्हें एक-एक करके पढ़ा और उन पर बोलीं; वही 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में है। नीचे: इस पंक्ति के साथ क्या खड़ा है, उस पर उनकी टिप्पणी, और यह यहाँ क्यों है।
इसके साथ, श्रीअरविन्द
यदि तेरा हृदय दुःखी है, यदि बहुत समयसे तूने कुछ भी प्रगति नहीं की है, यदि तेरी शक्ति शिथिल और निस्तेज हो गयी है, तो हमेशा हमारे प्रेमी प्रभुका यह शाश्वत शब्द याद रख: “मैं तुझे समस्त पाप और अशुभसे मुक्त कर दूंगा; शोक मत कर।”
श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र २८१ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३०७)इस पर, श्रीमाँ
जिसे श्रीअरविन्द यहां आत्मा कहते हैं वह हममेंसे प्रत्येकमें उपस्थित भागवत उपस्थिति है; और हमारे अंदरकी इस उपस्थितिकी सुनिश्चितिको हमें अंतिम अनिवार्य विजयका विश्वास दिलाते हुए हमारे सब दुःख-दर्दमें सांत्वना देनी चाहिये।
श्रीमाँ, 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३०७, १०-१-७०यह यहाँ क्यों है
उसके लिये जो कुछ महसूस नहीं करता: शान्ति वहाँ है, ‘चाहे वे देखें या न देखें’। उसके बाद का सूत्र गीता का वचन है (१८.६६), और श्रीमाँ बताती हैं कि यहाँ ‘आत्मा’ का अर्थ क्या है: हममें से हर एक में उपस्थित भागवत उपस्थिति। यह पढ़ना हमारा है।
हर सूत्र, श्रीमाँ की टिप्पणी के साथ, आश्रम की साइट पर पढ़िये →
एक लम्बी साँस
५बैठक
हर समूह की सावधानियाँ उसके अपने चरणों के साथ आती हैं।
क्या साथ लेकर चलेंगे?
बैठक
बैठक शुरू कीजिए →क्या साथ लेंगे, यह चुनिए, फिर बैठक खुलती है।
बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, धीमा। फिर हर आसन में थोड़ी धीमी होती जाती है, लगभग छह साँस एक मिनट तक। हर पंक्ति साँस भीतर आते समय मन में पढ़ी जाती है, सफ़ेद, और बाहर जाते समय बोलकर कही जाती है, सुनहरी।
- आसनसूर्य का एक आसन, जितनी देर आप रहें।
- साँसगायत्री · जैसे संध्या में कहा जाता है
- जपवही शब्द, बैठकर।
- विश्रामशशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
या कोई एक, अकेले: आसन · साँस · जप · विश्राम
विश्राम
शशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।
शशाङ्कासनकूल्हे एड़ियों पर बैठा लीजिए। माथा ज़मीन पर, हाथ आगे फैले हुए। अब मुँह बंद करके तीन बार गुंजन कीजिए।
शवासनपैर सीधे कीजिए और पीठ के बल लेट जाइए। पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में। आँखें बंद। अब तीन बार ॐ का उच्चारण कीजिए, और उसकी गूँज पूरे शरीर में महसूस कीजिए।
यह क्यों
भरत आठ रस गिनाते हैं, और शान्त उनमें नहीं है। एक पांडुलिपि शान्त पर एक अंश जोड़ती है, जिसे घोष प्रक्षिप्त कहते हैं (६.८२ पर उनकी टिप्पणी)। इसलिये भरत से इसका कोई रंग, देवता या स्वर नहीं है। इसका दीया साइट का अपना सुनहरा रंग है, धीमा किया हुआ, और वह रंग हमारा है।
भरत शान्त को कोई लय या काकु नहीं देते। इसका धीमा, बोलकर आरंभ हमारा है।
भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।
यह सुन्नपन की साँस है, और उस रास्ते पर यही शब्द भी है। जब कुछ महसूस न हो तो मन रुक गया होता है, और यह मंत्र एक ही बात माँगता है, कि वह चल पड़े।
गायत्री: जो सबको चलाता है, उसी प्रकाश से यह प्रार्थना कि बुद्धि चल पड़े।
इस साइट पर यह काम आता है: छोड़ने के बाद के फीके महीने, ध्यान और याद.
प्रह्लाद की नवधा भक्ति (श्रीमद्भागवत ७.५.२३) में से यह बैठक सचमुच ये रूप रखती है: कीर्तन · स्मरण · वन्दन। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।