इन्द्रिय-शिक्षा · फ़ोन के बिना

साथ ले जाने को पाँच पंक्तियाँ

इस घर का हर अभ्यास पाँच पंक्तियाँ भी है, जिन्हें तुम सिर में साथ ले जा सकते हो, और बस में, खेत में, अस्पताल के बिस्तर पर कर सकते हो। पेज अभ्यास में मदद है, अभ्यास नहीं।

पेज के बिना दबाए रखने को कुछ नहीं। वापसी का रास्ता हर एक में एक ही है: आँखें खोलो, और जिस रास्ते गए थे उसी से सबसे पास की चीज़ तक लौट आओ। वह कभी दूर नहीं।

जानना

Jānnā
  1. पास की एक चीज़; फूल हो तो फूल।
  2. उसका ठीक ठीक रंग। “लाल” नहीं: यह लाल। उसका आकार, उसका नाप, उस पर पड़ती रोशनी।
  3. उसकी महक, अगर हो। उँगली के सिरे के नीचे उसकी बनावट।
  4. आँखें बंद करो और सब कुछ एक साथ मन में रखो।
  5. आँखें खोलो और फिर देखो। जो छूट गया था, बस दिख जाता है।
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निखारना

Nikhārnā
  1. दो चीज़ें जो लगभग एक सी हों: एक ही पेड़ के दो पत्ते, दो घंटियाँ, दो नमक।
  2. पहली, अकेली। फिर दूसरी, अकेली।
  3. दोनों में फ़र्क़ कहाँ है? कौन अच्छी है, यह नहीं: बस कहाँ।
  4. फिर पहली, फिर दूसरी। अब हर एक और ज़्यादा अपने जैसी है।
  5. एक तीसरी जोड़ो, और तीनों को रहने दो, हर एक अपनी।
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नादमय

ध्वनि, आकाश तक
  1. सबसे पास की ध्वनि। तब तक सुनो जब तक ठीक ठीक सुनाई न दे।
  2. और दूर, और दूर, सबसे दूर तक जो सुनाई दे। उसके पार, मौन। ठहरो।
  3. उसी रास्ते वापस, एक एक ध्वनि, सबसे पास वाली तक।
  4. भीतर: नथुनों में साँस, गले में, हृदय, उसकी धड़कन, दो धड़कनों के बीच, एक अनुभूति, और उसमें मौन।
  5. धड़कन, गले, नथुनों से होकर बाहर। तुम वहीं हो जहाँ से चले थे।

ड्रोन के बिना: एक बार बजाई गई घंटी, उसके मिट जाने तक सुनी हुई, यही ढलना है।

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स्पर्शमय

स्पर्श, हवा तक
  1. कपड़े पर, या अपनी ही हथेली पर उँगली का सिरा। उसे ठीक ठीक महसूस करो: उसकी बनावट, उसकी गर्माहट या ठंडक।
  2. हल्का, बस छूता हुआ, छूता नहीं, बस उसकी याद।
  3. फिर फैलो: शरीर पर कपड़े, नीचे की ज़मीन, त्वचा पर हवा, धरती पर बहती हवा, कोई किनारा नहीं। मौन में ठहरो।
  4. उसी रास्ते कसे हुए स्पर्श तक वापस। फिर भीतर: नथुनों पर ठंडी साँस, उठती हुई छाती, नब्ज़, एक अनुभूति।
  5. नब्ज़, छाती, नथुनों से होकर बाहर। तुम वहीं हो जहाँ से चले थे।

अगर शरीर को छूने से दर्द हो, तो हाथ में एक कपड़ा या पत्थर ही पूरा अभ्यास है।

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ज्योतिर्मय

दृष्टि, रोशनी तक
  1. तुम्हारे पास की एक चीज़। उसे ठीक ठीक देखो: उसका रंग, उसकी किनारी, उस पर रोशनी कहाँ पड़ती है।
  2. सामने की दीवार, खिड़की, क्षितिज, आकाश, आकाश की गहराई, कोई किनारा नहीं। मौन में ठहरो।
  3. उसी रास्ते पास की चीज़ तक वापस।
  4. आँखें बंद करो: जो रोशनी रह जाती है, अँधेरा, भौंहों के बीच, हृदय, एक रोशनी जो महसूस होती है।
  5. अँधेरे से होकर वापस, और आँखें खोलो पास की उसी चीज़ पर।

सूरज को ख़ुद कभी नहीं।

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रसमय

स्वाद, जल तक
  1. जीभ पर कोई छोटी चीज़: गुड़ का दाना, नमक का, नीम का पत्ता, पानी का एक घूँट। स्वाद को ठीक ठीक जानो।
  2. मिटते हुए उसके साथ चलो: बाद का स्वाद, बस एक निशान, कोई स्वाद नहीं।
  3. जीभ पर पानी की एक बूँद, फैलती हुई: कटोरी, मटका, कुआँ, बारिश, सागर, कोई किनारा नहीं। मौन में ठहरो।
  4. जल से होकर बूँद तक वापस। फिर भीतर: आराम में जीभ, निगलना, नीचे जाती गर्माहट, हृदय, एक अनुभूति।
  5. बाहर लौटो, और उसी चीज़ का दूसरा स्वाद लो, पूरा।
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गन्धमय

गन्ध, धरती तक
  1. नाक के पास एक फूल, एक पत्ता या इत्र की एक बूँद। महक को ठीक ठीक जानो।
  2. उसे दूर ले जाओ: एक हाथ, बाँह भर, नीचे रखी हुई, जब तक हवा में बस एक निशान न रह जाए।
  3. फिर फैलो: कमरा, आँगन, गाँव, पूरी धरती, कोई किनारा नहीं। मौन में ठहरो।
  4. पास, और पास, नाक पर महक तक वापस। फिर भीतर: गला, छाती, हृदय, एक अनुभूति।
  5. छाती और गले से होकर नथुनों तक बाहर। तुम वहीं हो जहाँ से चले थे।

अगर छाती कमज़ोर है, तो धुआँ या अगरबत्ती नहीं।

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पाँचों

Pānchõ
  1. जो सुनाई देता है, जो तुम्हें छूता है, जो दिखता है, मुँह का स्वाद, हवा की गन्ध।
  2. पाँचों एक साथ। जब मन किसी एक पर अटके, बाक़ियों को धीरे से वापस ले आओ।
  3. उन्हें साथ साथ फैलने दो: ध्वनि आकाश में, स्पर्श हवा में, दृष्टि रोशनी में, स्वाद जल में, गन्ध धरती में।
  4. कोई किनारा नहीं, एक मौन। ठहरो।
  5. साथ साथ वापस, जिस रास्ते गए थे, पास के पाँचों तक।
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ये पंक्तियाँ इसी घर के अभ्यास हैं, छोटे करके, ताकि याद रह सकें। ये कुछ ऐसा दावा नहीं करतीं जो वे अभ्यास ख़ुद नहीं करते।

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