रस · भयानक

डर, घबराहट

डर भी जागा हुआ होना है। यहाँ वह झुकता है, और फिर उठता है।

पूर्ण प्रेम भयको भगा देता है; किंतु फिर भी उस निर्वासनकी कुछ कोमल परछाई और स्मृति बनाये रखो, वह पूर्णताको पूर्णतर बना देगी।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४१७ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३४९) पूरा प्रसंग →

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१कथा

राहगजेन्द्र, जिसका बल सरोवर में चुक गया

झुंड का राजा

त्रिकूट नाम के पर्वत पर हाथियों के एक झुंड का स्वामी रहता था। वह वन में चलता तो पूरे पेड़ तोड़ता चलता, काँटे, बाँस, सब कुछ। उसकी गंध भर से सिंह और दूसरे हाथी, बाघ और गैंडे, बड़े नाग, भेड़िये और सूअर भाग जाते, और छोटे जीव, हिरन और खरगोश, बेखटके घूमते, क्योंकि वह उन्हें घूमने देता। जब वह चलता, पर्वत काँपता था। 8.2.20 से 23

एक तपते दिन, मद की गर्मी में घूमती आँखों के साथ, उसने हवा में कमलों की गंध पाई और अपने प्यासे झुंड को एक सरोवर तक ले आया। वह भीतर उतरा और जी भर पानी पिया, और उसकी थकान उतर गई। सूँड़ में पानी भरकर उसने अपनी हथिनियों और बच्चों पर बौछार की, उन्हें पानी पिलाया, नहलाया, जैसे कोई गृहस्थ अपने घर को सँभालता है। मद में डूबा, उसने नहीं देखा कि क्या आ रहा है। 8.2.24 से 26

स पुष्करेणोद्धृतशीकराम्बुभिर्निपाययन्संस्नपयन्यथा गृही।
घृणी करेणुः करभांश्च दुर्मदो नाचष्ट कृच्छ्रं कृपणोऽजमायया॥श्रीमद्भागवत 8.2.26

पकड़

एक मगर ने, जो उससे बलवान था, क्रोध में उसका पैर पकड़ लिया। उस पर्वत का सबसे बलवान जीव पकड़ा गया। वह अपने पूरे बल से लड़ा। अपने स्वामी को खिंचते देख हथिनियाँ चीख उठीं; दूसरे हाथी सहायता को आए, पीछे से खींचा, और उसे छुड़ा न सके। 8.2.27 से 28

हज़ार बरस

इस तरह हाथी और मगर लड़ते रहे, हर एक दूसरे को खींचता, भीतर पानी की ओर, बाहर किनारे की ओर, और हज़ार बरस बीत गए। देवता देखते रहे और उन्हें विश्वास न हुआ कि दोनों अब भी जीवित हैं। 8.2.29

ततो गजेन्द्रस्य मनोबलौजसां कालेन दीर्घेण महानभूद्व्ययः।
विकृष्यमाणस्य जलेऽवसीदतो विपर्ययोऽभूत्सकलं जलौकसः॥श्रीमद्भागवत 8.2.30

और उस लंबे समय में उसके मन का, देह का और तेज का बल चुक गया। वह खिंचता रहा, पानी में धँसता रहा, और जिसका घर ही पानी था, उसके लिये सब उलटा होता गया। 8.2.30

पुकार

जब छूटने के लिये वह और कुछ न कर सका, तब बहुत देर सोचने के बाद, धीरे-धीरे, एक विचार उसके मन में आया। 8.2.31 से 33

न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम्।
ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतोऽप्यहं च तं यामि परं परायणम्॥श्रीमद्भागवत 8.2.32

मेरे अपने, ये हाथी, मेरी इस विपदा में मुझे नहीं छुड़ा सकते; हथिनियाँ कैसे छुड़ाएँगी? यह मगर मुझे विधाता के फंदे की तरह पकड़े है। फिर भी मैं उन्हीं के पास जाता हूँ, जो परम आश्रय हैं: जो भय में शरण आए हर एक की रक्षा करते हैं, और जिनके भय से मृत्यु भी भागती है। 8.2.32 से 33

और पानी में से उसने प्रार्थना शुरू की। उसके पहले शब्द वही हैं जो यह साइट विस्मय को देती है: 8.3.2

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥श्रीमद्भागवत 8.3.2

ॐ, उन भगवान को नमस्कार, जिनसे यह सब, जो चेतना है, आता है; उन पुरुष को, आदि बीज को, परम ईश्वर को, हम मन से ध्याते हैं। उसकी पूरी प्रार्थना इस दीये का स्तोत्र है, तीसरा द्वार। 8.3.2 से 29

कमल

उसकी प्रार्थना निर्गुण से थी, किसी एक रूप से नहीं, इसलिये ब्रह्मा और दूसरे देवता, हर एक अपने रूप में लगा, नहीं आए। हरि आए, जो उन सब में हैं: वेदों के छन्दों से बने गरुड़ पर, हाथ में चक्र, तुरंत, वहाँ जहाँ गजेन्द्र था। 8.3.30 से 31

सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम्।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रान्नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते॥श्रीमद्भागवत 8.3.32

अब भी सरोवर के बीच, अब भी उस भारी बल की पकड़ में, पीड़ा में, उसने आकाश में गरुड़ पर हरि को देखा, और कमल लिये अपनी सूँड़ ऊपर उठाई, और कठिनाई से कहा: नारायण, सबके गुरु, भगवन, आपको नमस्कार। 8.3.32

कठिनाई से। विजय का कोई नारा नहीं। अब कोई सुंदर स्तुति नहीं। कुछ शब्द, जैसे-तैसे निकले, और पानी से ऊपर उठाया एक कमल। उसके पास बस इतना बचा था, और इतना काफ़ी था।

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार।
ग्राहाद्विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं संपश्यतां हरिरमूमुचदुच्छ्रियाणाम्॥श्रीमद्भागवत 8.3.33

उसे पीड़ा में देखकर अजन्मा तुरंत उतरे और करुणा से उसे सरोवर से बाहर खींच लिया, मगर समेत। और सबके देखते, उन्होंने गजेन्द्र को उन जबड़ों से छुड़ा दिया। 8.3.33

उसका सरोवर

हर ज्योतिर्गण कभी झुंड का राजा रहा है। बलवान, जिस पर दूसरे टिकते थे, तपते दिन पानी की ओर उतरता हुआ, क्योंकि वह ठंडा था और उसमें कमलों की गंध थी। पकड़े जाने के लिये कोई सरोवर में नहीं उतरता।

फिर पकड़, और बरस। परिवार ने पीछे से खींचा और छुड़ा न सका, और यह उनकी हार नहीं थी। कथा इस बारे में सच्ची है: हज़ार बरस, मन का, देह का, तेज का बल चुक गया। वह इसके लिये उसे कमज़ोर नहीं कहती। वह अंत तक उसे झुंड का राजा कहती है।

और पुकार उसके बल से नहीं आई। वह तब आई जब बल जा चुका था। यही वह भय है जिसके लिये यह दीया है: उसका भय जिसने सब कुछ करके देख लिया और अब भी पकड़ में है। कथा यह वादा नहीं करती कि पकड़ कल ढीली हो जाएगी। वह बताती है कि जब कुछ नहीं बचा तब गजेन्द्र ने क्या किया: उसके पास जो एक कमल था वह ऊपर उठाया और जो थोड़े शब्द कह सका वह कहे। कठिनाई से कहना काफ़ी है।

कथा: श्रीमद्भागवत, 8.2.20 से 8.3.33, संस्कृत में, GRETIL के पाठ में (उलरिख़ श्टील) पढ़ी गई; श्लोक संख्या उसी पाठ की है। हिन्दी में कहना हमारा है, और इसका उसके लिये क्या अर्थ है, यह भी।

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२अभिनय

पहले, चाहो तो: की ओर →अँधेरे में एक आवाज़ ठहरी है। उसकी ओर जाओ। फिर बैठक के लिये यहीं लौट आओ।

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४वाणी

श्रीमाँ की डायरी, प्रार्थना और ध्यान, का एक पूरा पन्ना, जैसा उन्होंने इस दिन लिखा: भगवान् से एक प्रार्थना, यहाँ पूरी। यह इस दीये पर है, यह हमारा चुनाव है।

श्रीमाँ · ३ दिसंबर, १९१२

कल शामको मैंने अनुभव किया कि तेरा पथप्रदर्शन प्राप्त करनेके लिये विश्वासपूर्ण आत्मसमर्पण कितना सफल होता है। जब किसी बातको जानना आवश्यक होता है तब मनुष्य उसे जान ही लेता है और उस समय मन जितना तेरे प्रकाशके प्रति निष्क्रिय हो उतने ही अधिक पर्याप्त और स्पष्ट रूपमें तेरा प्रकाश व्यक्त होता है।

मैंने तुझे अपने अंदर बोलते हुए सुना तो मेरी इच्छा हुई कि जो कुछ तूने कहा है उसे लिख लूं जिससे वह सम्यक् सूत्र कहीं खो न जाय — वस्तुतः जो तूने कहा था उसे मैं अब शायद ही दुहरा सकूं। पर मैंने अनुभव किया कि यह सुरक्षित रखनेकी चिंता भी तेरे प्रति विश्वासकी अपमानजनक कमीकी द्योतक है। मुझे जो कुछ बनना चाहिये वह तू मुझे, जहांतक मेरा आंतरिक भाव तुझे मुझपर तथा मेरे अंदर कार्य करनेकी अनुमति देता है, निश्चय ही बना सकता है। तेरी सर्वशक्तिमत्ता असीम है। यह जानने योग्य है कि जो तुझे सब जगह और सब चीजोंमें देखना जानते हैं उनके लिये प्रति क्षण जो होना चाहिये वह यथासंभव पूर्णताके साथ होता जा रहा है। अब और भय नहीं, विकलता नहीं, क्षोभ नहीं; है केवल पूर्ण आत्मप्रसाद, अखंड विश्वास, परम अचल शांति!

श्रीमाँ, प्रार्थना और ध्यान, पृष्ठ ५

पूर्ण प्रेम भयको भगा देता है; किंतु फिर भी उस निर्वासनकी कुछ कोमल परछाई और स्मृति बनाये रखो, वह पूर्णताको पूर्णतर बना देगी।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४१७ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३४९)

विचार और सूत्र से: लगभग १९१३ में श्रीअरविन्द ने इन्हें एक कॉपी में लिखा, तीन शीर्षकों में, ज्ञान, कर्म और भक्ति, और कभी छपने के लिये तैयार नहीं किया। श्रीमाँ ने १९५८ से १९७० तक इन्हें एक-एक करके पढ़ा और उन पर बोलीं; वही 'विचार और सूत्र' के प्रसंग में है। नीचे: इस पंक्ति के साथ क्या खड़ा है, उस पर उनकी टिप्पणी, और यह यहाँ क्यों है।

इसके साथ, श्रीअरविन्द

भगवान्‌से डरनेका अर्थ है अपने-आपको उनसे दूर ले जाना, किंतु खेल-खेलमें उनसे डरना आनंदको अधिक तीव्र बना देता है।

श्रीअरविन्द, विचार और सूत्र ४१४ ('विचार और सूत्र' के प्रसंग में, पृ. ३४९)

यह यहाँ क्यों है

ये सूत्र भगवान् के सामने आत्मा के भय की बात करते हैं, प्रेम के भीतर; गली, रात या शरीर के डर की नहीं। यह यहाँ उस बात के लिये है जो यह साफ़ कहता है: भय ज़बरदस्ती नहीं निकाला जाता, और उसका जो बचा रहे वह कोमल बन सकता है। इस सूत्र पर श्रीमाँ की कोई टिप्पणी नहीं है। यह पढ़ना हमारा है।

हर सूत्र, श्रीमाँ की टिप्पणी के साथ, आश्रम की साइट पर पढ़िये →

एक लम्बी साँस

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५बैठक

डर और घबराहट में इस रास्ते पर कहीं भी साँस नहीं रोकी जाती।

हर समूह की सावधानियाँ उसके अपने चरणों के साथ आती हैं।

क्या साथ लेकर चलेंगे?

बैठक

बैठक शुरू कीजिए →

क्या साथ लेंगे, यह चुनिए, फिर बैठक खुलती है।

बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, नीचा और तेज़। फिर हर आसन में थोड़ी धीमी होती जाती है, लगभग छह साँस एक मिनट तक। हर पंक्ति साँस भीतर आते समय मन में पढ़ी जाती है, सफ़ेद, और बाहर जाते समय बोलकर कही जाती है, सुनहरी।

  1. आसनआरोहण के २ आसन, हर एक में शब्द कई बार
  2. साँसहंस · साँस के अपने दो अक्षर
  3. जपवही शब्द, बैठकर।
  4. विश्रामशशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।

या कोई एक, अकेले: आसन · साँस · जप · विश्राम

विश्राम

शशाङ्कासन या शवासन, कोई भी। कुछ गिनना नहीं।

शशाङ्कासनशशाङ्कासन

कूल्हे एड़ियों पर बैठा लीजिए। माथा ज़मीन पर, हाथ आगे फैले हुए। अब मुँह बंद करके तीन बार गुंजन कीजिए।

शवासनशवासन

पैर सीधे कीजिए और पीठ के बल लेट जाइए। पैर थोड़े खुले, हाथ शरीर के बग़ल में। आँखें बंद। अब तीन बार ॐ का उच्चारण कीजिए, और उसकी गूँज पूरे शरीर में महसूस कीजिए।

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६आगे

हर राह शान्त पर, बीच में, ख़त्म होती है। वह राह किसी और दिन के लिये है। →

माला

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यह क्यों

भरत के नाट्यशास्त्र में यह भयानक रस है। इसका स्थायी भाव भय है; रंग कृष्ण; देवता काल; स्वर धैवत (घोष, खंड १: ६.१७, ६.४२ से ४५, १९.३८ से ४०)। दीया वही रंग रखता है।

भरत इस अवस्था को द्रुत लय, द्रुत और नीची काकु और अनुदात्त, स्वरित व कम्पित उच्चारण देते हैं (घोष, खंड १: लय १९.५८ से ५९ के बाद के गद्य में, पृ. ३५१; काकु १९.५८ से ५९ में, पृ. ३५०; उच्चारण १९.४३ में, पृ. ३४७)। इसलिये बैठक ऐसे शुरू होती है: बोलकर, नीचा और तेज़। जहाँ यह ख़त्म होती है, धीमी, वह हर अवस्था के लिये एक है: लगभग छह साँस एक मिनट में, वह गति जिस पर माला और योग का मंत्र पढ़ते हुए साँस अपने आप ठहर गई (बर्नार्डी और साथी, BMJ 2001, 323, पृ. 1446 से 1449)। हर अवस्था को वहीं ख़त्म करना हमारा है।

भरत ने अभिनेता और दर्शक के लिये लिखा था। यहाँ आप दोनों हैं, और यह सब भगवान की ओर मुड़ा है। यह मोड़ हमारा है, भरत का नहीं।

यह डर और शर्म की साँस है, हल्केपन की, और उस समय की जब पता न चले कि भीतर क्या है। भीतर और बाहर बराबर लंबे हैं, और यह पन्ना साँस को कहीं रुकने को नहीं कहता।

महामृत्युञ्जय: जैसे पकी ककड़ी अपने डंठल से अपने आप छूट जाती है, वैसे ही मैं मृत्यु से छूटूँ, अमृत से नहीं।

इस साइट पर यह काम आता है: पहले दिन.

प्रह्लाद की नवधा भक्ति (श्रीमद्भागवत ७.५.२३) में से यह बैठक सचमुच ये रूप रखती है: कीर्तन · स्मरण · वन्दन। हर रस भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है, यह रूप गोस्वामी की शिक्षा है, उनके भक्तिरसामृतसिन्धु में।

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तीसरा घेरामन