ज्योतिर्गण

अलाव

अलाव · पहला समूहयहाँ कुछ भी एक ही तरफ़ नहीं रोका जातापहला समूह अभ्यास नहीं है, अभ्यास की तैयारी है। और वह पूरा का पूरा जोड़ों में बना है: ऊपर, फिर पीछे। खुलना, फिर मुड़ना। झुकना, फिर उठना।अलाव · दूसरा समूहसाँस छोटी क्यों हो गईफेफड़े छोटे नहीं हुए। उनके ऊपर की पिंजरी बंद हो गई। दूसरा समूह उसी पिंजरी पर काम करता है।अलाव · तीसरा समूहएक तरफ़ किया हुआ दूसरी तरफ़ पहुँच जाता हैतीसरे समूह में हर चीज़ पहले एक पैर पर होती है, फिर ठीक उतनी ही दूसरे पर। यह बराबरी की बात नहीं है। यह इससे बड़ी बात है।अलाव · चौथा समूहजितना खुल सकते हैं, उतना ही ऊपर जा सकते हैंचौथे समूह में हाथ चार बार खुलते हैं, हर बार पहले से ज़्यादा। और ठीक उसी समय पैरों के नीचे की ज़मीन कम होती जाती है।अलाव · पाँचवाँ समूहमांसपेशी लंबी नहीं होती। इजाज़त बढ़ती है।इस समूह का नाम है साहस। सवाल यह है कि पीछे जाने से रोकता कौन है, और वह चीज़ बदलती कैसे है।अलाव · छठा समूहजितना उठा नहीं सकते, उतना उतार सकते हैंइस समूह का नाम है अस्त और उदय। उसमें अस्त पहले आता है, और यह क्रम का नहीं, ताक़त का मामला है।अलाव · सातवाँ समूहसबसे ऊँची जगह तक धीरे, और फिर बार-बारइस समूह में छाती तीन बार चढ़ती है, हर बार ज़मीन से शुरू करके और पिछली बार से एक पायदान ऊँची। फिर सबसे ऊँची जगह पर बार-बार लौटा जाता है, और हर बार के बाद शरीर फिर नीचे आता है।अलाव · आठवाँ समूहकुछ भी ज़मीन को नहीं धकेलताहर पिछले समूह के पास हाथ थे, जिनसे ज़मीन को दबाया जा सके। यहाँ बाँहें बग़ल में पड़ी रहती हैं और जो कुछ उठता है, उसे पीठ उठाती है।अलाव · नौवाँ समूहउन्हीं क़दमों से नीचेजो शरीर चैन नहीं लेने देता, उसकी चौकसी बंद होना भूल गई है। यह समूह एक बार उतना ऊपर जाता है जितना पूरा अभ्यास जाता है, और फिर इतने धीरे उतरता है कि कुछ भी गिराया नहीं जाता।जटिलता · पहले दिन: छोड़ने की बीमारीझुका पेड़ सीधे से आगे झूलता है, फिर खड़ा होता हैजम्हाई, बहती नाक, रोंगटे, हड्डियों में दर्द, मरोड़ती और दौड़ती आँत, तेज़ दिल, और नींद नहीं। इसमें कुछ भी शरीर का टूटना नहीं। बरसों शरीर दवा के सामने ज़ोर लगाए खड़ा रहा, उलटी ओर, ताकि वह बराबर रहे; दवा हटी, तो उस ज़ोर के सामने कुछ नहीं, और कुछ दिन वह आगे झूल जाता है। हर लक्षण दवा का अपना काम है, उलटा होकर, और हर एक उसका अपना तंत्र है जो पूरे समय वहीं था। शिविर उस ज़ोर को जाने की जगह देता है: सुबह हरकत, दिल के बैठने तक शवासन, शाम को सूक्ष्म अभ्यास, और सोने से पहले चुप्पी।जटिलता · तलब: वह पल, और वह दिनतस्वीर को आने दीजिए; आँखों को दूसरा काम दीजिएएक गंध, एक जगह, दिन का एक पहर, और खिंचाव आ जाता है: उसकी एक तस्वीर, और राहत की, और शरीर जैसे पहले से तैयार होता हुआ। उसमें कुछ भी हारना नहीं। बरसों शरीर ने उन इशारों पर तैयार होना सीखा, और अच्छी तरह सीखा। तस्वीर मन के एक छोटे कमरे में रखी जाती है, और कमरा छोटा है: आँखों को दूसरा काम दीजिए, और तस्वीर की चमक घटती है। इसलिए शिविर खिंचाव से नहीं लड़ता। वह उसके साथ बैठता है, बाहर की साँस लंबी करता है, शरीर बेचैन हो तो चलता है, और उन मिनटों के लिए, जब तस्वीर सबसे चमकीली हो, आँखों को काम देता है।जटिलता · नींदनींद दिन में बनती है, रात में आने दी जाती हैअफ़ीम नींद छीनती नहीं। वह नींद की सबसे गहरी परत छीनती है, और वह परत रात में नहीं, दिन में बनती है। रात का काम बस दरवाज़ा खोलना है।जटिलता · आँतवह तकलीफ़ जिसके बारे में कोई नहीं पूछताअफ़ीम के बहुत से असर के साथ शरीर समय के साथ समझौता कर लेता है। आँत का आख़िरी हिस्सा सबसे कम करता है।जटिलता · पेट का ऊपरी हिस्सापेट के ऊपर दो दरवाज़े; एक साँस का हैजहाँ भोजन-नली पेट से मिलती है, वहाँ दो छल्ले हैं: एक चिकना, जिसे दवा थामती है, और उसके चारों ओर डायाफ़्राम, वह मांसपेशी जिसे साँस साधती है। पेट पर दवा की पकड़ आँत की दीवार में है, और दवा जाते ही छूटती है। दूसरा दरवाज़ा अभी से उसका है: खाने के बाद पेट की साँस, धीरे खाया खाना, और पेट नीचे।जटिलता · दर्दवह दर्द जिसका एक हिस्सा दवा ने बनायालंबे समय तक अफ़ीम लेने से दर्द रोकने वाली व्यवस्था पलटकर दर्द बढ़ाने लगती है। पर शरीर के पास दर्द घटाने के और भी रास्ते हैं, और उनमें से एक, साँस पर टिका ध्यान, अफ़ीम वाले रास्ते से होकर जाता ही नहीं।जटिलता · ताक़त और हड्डीदूसरा आदेश नीचे से आता हैअफ़ीम ऊपर से आने वाले आदेश, टेस्टोस्टेरोन, को दिमाग़ में रोक लेती है। पर मांसपेशी और हड्डी एक दूसरा आदेश भी सुनती हैं, बोझ, और वह नीचे से, शरीर के अपने वज़न से आता है। उसके रास्ते में दवा कभी खड़ी नहीं हुई।जटिलता · हड्डीहड्डी पहले कुछ झटके सुनती हैहड्डी पत्थर नहीं है। उसमें हर पल लाखों जगह पुरानी हड्डी हटती और नई बनती रहती है, और वह उतनी बनती है जितना उससे आज माँगा जाए। वह सबसे ध्यान से कुछ अचानक झटके सुनती है, और फिर थोड़ा आराम।जटिलता · संतुलनअँधेरे में पैर देखते हैंसंतुलन कोई जमा-पूँजी नहीं जो ख़र्च होकर ख़त्म हो जाए। वह एक फ़ैसला है, जो हर पल नए सिरे से होता है, तीन गवाहों के कहने पर: आँखें, भीतर का कान, और तलवों, टख़नों और गर्दन में शरीर की अपनी समझ। अँधेरे में एक गवाह चुप हो जाता है, और बाक़ी दो उसे सँभालते हैं। वे दोनों सधते हैं; जल्दी सधते हैं, और ठीक वही सीखते हैं जिसका अभ्यास हो।जटिलता · यौन जीवनथामना, और छोड़ देनाजड़ से उससे कुछ छीना नहीं गया। वहाँ आदमी को तीन चीज़ें थामती हैं: पहुँचता हुआ ख़ून, जड़ की एक मांसपेशी जो उसे वहाँ थामती और फिर छोड़ती है, और इतना निश्चिंत मन कि दोनों होने दे। मांसपेशी किसी भी मांसपेशी की तरह सधती है, ख़ून मेहनत को सुनता है, और निश्चिंतता साँस पर सीखी जाती है। इनमें से कुछ भी ख़त्म नहीं हुआ।जटिलता · पेशाबज़ोर से बंद होता है, साँस से खुलता हैपेशाब के लिए दो चीज़ें चाहिए: ऊपर से मूत्राशय का दबाना, और नीचे एक द्वार जो खुले। दवा दबाने को धीमा करती है और बुलावे को धुँधला; दवा जाती है, तो दोनों पूरे लौटते हैं। द्वार उसका अपना है। ज़ोर लगाने से वह कस सकता है; साँस के साथ वह हर बार थोड़ा नीचे उतरता है।जटिलता · रोग-प्रतिरोधपहरेदार कहीं नहीं गएशरीर के पहरेदार खोए नहीं थे। उन्हें दवा से ज़्यादा उसके आसपास का झूला दबाता है: ख़ुराक और तलब, टूटी रातें, तनाव का हार्मोन। जहाँ दिन ठहरे, वहाँ वे किसी के भी जितने अच्छे मिले। और वे तीन सीधी चीज़ों को सुनते हैं: चलना, सोना, और शांत मन।जटिलता · मुँह और दाँतसोता सूखा नहीं, थमा थालार दाँतों की अपनी मरम्मत है, और दवा उसे थामती है, सुखाती नहीं। खुला मुँह जो बचा है उसे हवा में उड़ा देता है। मुँह की अपनी मांसपेशियाँ, नाक से साँस, और ज़ोर से बोला गया मंत्र उसे फिर बहाते हैं। जो छेद बन चुके, वे दाँत के डॉक्टर के हैं।जटिलता · त्वचात्वचा बस संदेश लाती हैखुजली, पसीना, और रूखी, बुझी हुई त्वचा: यह त्वचा का हारना नहीं है। त्वचा अपने नीचे की हर चीज़ का संदेश लाती है: दवा की बजाई घंटी, धीमी आँत और उसके पतले पड़े जीवाणु, तेज़ चलती घबराहट, छोटी रातें। नीचे जो है वह बदलता है, तो त्वचा नया संदेश लाती है। आँत धुलती है और साफ़ खाने पर फिर बसती है; साँस और मेहनत ख़ून को त्वचा तक लाते हैं; नींद उसकी मरम्मत करती है; और खुजाने वाले हाथों को दूसरा काम मिलता है।जटिलता · दबाव और शुगरजो काम अफ़ीम को सौंपा था, वह पैर और साँस करते हैंवह मानता है कि अफ़ीम उसका दबाव और उसकी शुगर नीचे रखती है। कुछ देर के लिए दबाव गिर भी सकता है; बरसों में बात उलटी निकली। उस विश्वास से बहस नहीं। उसे तीन चीज़ें मिलती हैं जो वह काम करती हैं जो उसने अफ़ीम को सौंपा था: साँस चलाते हुए थमी बैठक, धीमी साँस, और रात के खाने के बाद की सैर।जटिलता · खड़े होते ही चक्करकमरा घूमता है; पैर उसे थाम लेते हैंखड़े होते ही कमरा घूमता है, या आँखों के आगे एक पल को धुँधला छा जाता है। उसमें कुछ टूटा नहीं: खड़े होने के पहले कुछ पलों में हर किसी का दबाव गिरता है, और अफ़ीम और गर्मी उस गिरावट को गहरा करती हैं। इलाज उसके अपने पैरों में है। खड़े होने के पल में कसे हुए पैर ख़ून को वापस ऊपर भेजते हैं; शिविर यह हर सुबह सिखाता है, और एक वाक्य बताता है कि इसे कब बरतना है।जटिलता · छोड़ने के बाद के फीके महीनेरंग दीवारों पर पहले से थेबीमारी गुज़रे हफ़्तों हो गए, फिर भी सब फीका है: थकान, टूटी नींद, और तलब लहरों में; और लोग कहते हैं कि अब तक तो ठीक हो जाना चाहिए था। उसमें कुछ नाकाम नहीं हुआ। दिमाग़ ने दवा के सामने अपने ही स्तर धीमे कर रखे थे, और बिना दवा की ज़िंदगी के लिए उन्हें फिर सधने में हफ़्ते और महीने लगते हैं; नापा गया, तो जो दूर रहे उनमें यह धूसर महीने-दर-महीने उठा। इसका इंतज़ार नहीं किया जाता। इसे पार किया जाता है, पूरे दिन को अभ्यास बनाकर।जटिलता · भारी मन: उदासी और डरडर साँस की ताल पर चलता हैछाती पर बोझ, बिना चेहरे का डर, और एक बीता हुआ कल जो बीतता नहीं। इसमें कुछ कमज़ोरी नहीं, और यह सब सिर्फ़ सिर में नहीं: दिमाग़ डर और भारीपन का कुछ हिस्सा शरीर से पढ़ता है, सबसे ज़्यादा साँस से। और उस पूरी चौकसी में साँस ही वह एक चीज़ है जो उसका कहा भी मानती है। हरकत आधे घंटे में मन उठाती है; लंबी बाहर की साँस, स्वर और लेटकर आराम चौकसी को नीचे लाते हैं।जटिलता · कुछ अच्छा नहीं लगताशरीर के पास अपनी अफ़ीम हैअफ़ीम ने कोई नई ख़ुशी नहीं दी थी। उसने शरीर की अपनी ख़ुशी का दरवाज़ा उधार लिया था, और वह दरवाज़ा अब भी वहीं है। मेहनत उसे भीतर से खोलती है। मेहनत के बाद का आराम वह जगह है जहाँ जो भीतर आता है, उसे पहचाना जा सके।जटिलता · ध्यान और यादमन उसी पर धार पाता है जो अभी नया हैध्यान टिकता नहीं, बात याद नहीं रहती, और रुकना मुश्किल है। यह टूटा हुआ मन नहीं है। यह अभ्यास से बाहर रहा मन है, और अभ्यास ठीक यही माँगता है: नज़र को टिकाना, क्रम को याद रखना, और रुकना।जटिलता · दमसाँस के पास वह जगह है जो अभी काम में नहीं आईथोड़ा चलते ही दम फूल जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि फेफड़े ख़त्म हो गए। अफ़ीम पर निर्भर पुरुषों में इसी प्रोटोकॉल के एक महीने के साँस वाले अभ्यास के बाद साँस बड़ी नापी गई, बाहर की रफ़्तार तेज़, और फेफड़ों की अनुमानित उम्र कम।जटिलता · रात की साँसरात की साँस दिन में सधती हैख़र्राटा, फिर एक चुप्पी, फिर एक हाँफ। नींद में साँस दो तरह से रुकती है: एक गले में, एक उस धक्के में जो हर साँस को चलाता है। गला मांसपेशी है, और मांसपेशी अभ्यास मानती है। वह अभ्यास सुबह और शाम होता है, ताकि रात के पास कम काम बचे।जटिलता · शर्म और अकेलापनजो वहाँ रहकर आया है, उसी की बात मानी जाती हैसालों तक उसे नाकाम कहा गया, और अब उसे लगता है कि कोई उसके पास नहीं बैठेगा। इसका जवाब इस अभ्यास में बातचीत से कम, साथ कुछ करने में ज़्यादा है: साथ गाना, एक आवाज़ पर चलना, और आख़िर में उसका ख़ुद आगे खड़ा होना। जो साल उसने वहाँ बिताए, वही उसकी योग्यता हैं।अलाव · चौथा चरणजिस लय पर दवा बैठी हैअफ़ीम साँस को कमज़ोर नहीं करती। वह उस लय को दबाती है जिससे साँस बनती है। और पूरे शरीर में वही अकेली लय है जिसे आदमी ख़ुद, बाहर से, बिना किसी दवा के चला सकता है।